दीपक जलाने का अर्थ होता है कि जीवन से सभी प्रकार का अन्धकार व कालिमा को दूर करना। हमारे जीवन में सबसे अधिक अन्धकार ईश्वर व आत्मा के यथार्थ ज्ञान का है। इसी कारण हमारा चरित्र भी कालिमा के समान प्रायः दूषित रहता है। हम सद्कर्म और असद्कर्म में अन्तर नहीं कर पाते और प्रलोभनों में फंस कर अकरणीय कृत्यों व अकर्तव्यों को कर बैठते हैं। इस पर विजय प्राप्त करने के लिए हमें सद्ज्ञान की आवश्यकता है जिसका मूल स्रोत ईश्वरीय ज्ञान की चार पुस्तकें वेद हैं। इनके नाम ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद हैं जो सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर के द्वारा चार ऋषियों के अन्तःकरण में प्रविष्ट कराये गये थे। आज भी यह अपने मूल रूप में सुरक्षित हैं और यह संस्कृत, हिन्दी व अंग्रेजी भाषा सहित कुछ अन्य भाषाओं में भी प्राप्त है।

  मनुष्य जीवन में परमात्मा ने सभी को बुद्धि दी है। बुद्धि का विकास ज्ञान का विकास माना जाता है। कहा गया है कि बुद्धि ज्ञान से शुद्ध होती है। जो व्यक्ति ज्ञानार्जन नहीं करता उसके पास भौतिक बुद्धि यन्त्र होने पर भी ज्ञान की दृष्टि से वह अपने जीवन को विवेकपूर्वक व्यतीत नहीं कर सकता। अतः जन्म के कुछ वर्षों बाद ही बालक को पहले घर में और बाद में विद्यालय या गुरुकुल में अध्ययन करने भेजा जाता है। आज कल न केवल भारत अपितु संसार भर के स्कूलों वा विद्यालयों में भौतिक विद्याओं व समाज विषयक सामान्य ज्ञान ही पढ़ाया जाता है। उसे ईश्वर, जीव व प्रकृति एवं धर्मा-धर्म विषयक यथार्थ ज्ञान नहीं दिया जाता। इसलिए आवश्यकता होती है कि वह अपने घर पर रहकर व पुस्तकों अथवा आर्यसमाज जैसी संस्थाओं का सदस्य बनकर वहां होने वाले आयोजनों व उपदेशों से अपना ज्ञान बढ़ाये और विद्वानों से शंका समाधान करता रहे। आर्यसमाज एक ऐसी संस्था है जहां विद्वान सभी विषयों पर विचार करते हैं और श्रोता की हर शंका का समाधान करते हैं। अन्य संस्थाओं में यह परिपाटी है कि उनके मत की पुस्तकों में जो सही व गलत लिखा है उससे वह बाहर नहीं जा सकते। इसलिए हमें यह लगता है कि किसी भी मत का अनुयायी अपने मत व उसकी पुस्तक के अल्प ज्ञान से आगे नहीं बढ़ सकते। इससे उनका ज्ञान व उन्नति अल्प व अपूर्ण होती है और बहुत से विषयों से वह अनभिज्ञ रहते हैं। वेद व वैदिक साहित्य में निहित सत्य ज्ञान से होने वाले लाभों से वह सर्वदा वंचित रहते हैं।

 ज्ञान मनुष्य के लिए सबसे महत्वपूर्ण व बहुत अच्छी वस्तु है जिसे प्राप्त करने के लिए मनुष्य को मनुष्य जन्म मिला है। कहा गया है कि ज्ञान से बढ़कर संसार में कुछ भी नहीं है। वैदिक धर्मी लोग ज्ञान प्राप्त करने में किसी अन्धविश्वास से ग्रस्त नहीं हैं। आर्यसमाजी को वेदों के साथ पुराण व अन्य सभी मतों के ग्रन्थों के अध्ययन करने की छूट है और वह करते भी हैं। अतीत में आर्यसमाज के पास बाइबिल, कुरान और पुराण आदि ग्रन्थों के भी बहुत बड़े बड़े विद्वान रहे हैं। आज भी आर्यसमाज में प्रायः सभी मतों का अल्प व अधिक ज्ञान रखने वाले सदस्य व विद्वान हैं। दूसरे किसी मत में यह बात नहीं है। सत्यार्थप्रकाश सत्य ज्ञान की पुस्तक है। इस पर भी विधर्मी व अन्य मत वाले लोग इसका अध्ययन नहीं करते। विचार करने पर यह ज्ञात होता है कि वह जानते हैं कि उनके मत की मान्यतायें अपूर्ण, विद्या विरुद्ध व भ्रम पैदा करने वाली हैं जिनका समाधान उनके पास नहीं है। यदि उनके मत के अनुयायी सत्यार्थ प्रकाश या वेद आदि पढ़ेंगे तो इन ग्रन्थों के सत्य विद्यायुक्त होने से अन्य मतों के अनुयायियों के विचार व भावनायें कहीं वैदिक धर्मी न हो जायें, यह डर अन्य सभी मतों के आचार्यों को होता है। इस कारण अन्य मत के लोग वेद व वैदिक साहित्य से परिचित व लाभान्वित नहीं हो पा रहे हैं। दूसरा कारण यह भी है कि आज हर व्यक्ति उस कार्य में रूचि लेता है जिससे धन का लाभ होता है। वैदिक धर्म को जानने व समझने के लिए उपदेश श्रवण सहित पुस्तकों का अध्ययन, समय व उस पर चिन्तन मनन करना आवश्यक होता है। इससे आर्थिक कार्यो में लगे लोग समया भाव के कारण भी रूचि नहीं लेते। इस कारण भी वैदिक धर्म व साहित्य का प्रचार होने में बाधायें आ रही हैं।

 अन्य मत मतान्तरों के ग्रन्थों में सिद्धान्त की बातें कम व न के बराबर एवं कहानी किस्से अधिक हैं जबकि वेद और सत्यार्थ प्रकाश में सिद्धान्त, सत्य विचार व उनका स्पष्टीकरण हैं न कि अनावश्यक कहानी किस्से। हम यहां सत्यार्थ प्रकाश में वर्णित विषयों की एक संक्षिप्त सूची दे रहे हैं जिससे अनुमान लगाया जा रहा है कि इस ग्रन्थ का महत्व क्या है? सत्यार्थप्रकाश के पहले समुल्लास में ईश्वर के 100 से अधिक नामों की व्याख्या एवं मंगलाचरण समीक्षा है।

दूसरे समुल्लास में बालशिक्षा, भूतप्रेतादिनिषेध, जन्मपत्रसूर्यादिग्रहसमीक्षा आदि अनेक विषय हैं।

तीसरे समुल्लास में अध्ययनाध्यापन, गुरुमंत्र वा गायत्रीमन्त्र व्याख्या, प्राणायामशिक्षा, सन्ध्याग्निहोत्रोपदेश, यज्ञपात्रों का वर्णन, उपनयन संस्कार समीक्षा, ब्रह्मचर्योपदेश, ब्रह्मचर्य के कृत्यों का वर्णन, पठन-पाठन की विशेष विधि, स्त्री शूद्र अध्ययन विषय आदि हैं।

चौथे समुल्लास में विवाह का विस्तृत विषय है, गुण, कर्म, स्वभावानुसार वर्ण व्यवस्था का वर्णन है, स्त्री पुरुष व्यवहार, पंचमहाज्ञविधि, पाखण्ड के लक्षण, गृहस्थ धर्म, पण्डित और मूर्खों के लक्षण, पुनर्विवाह और नियोग आदि विषय हैं।

पांचवे समुल्लास में वानप्रस्थ और सन्यास आश्रम का विषय वर्णित है।

छठे समुल्लास में राजधर्म विषय की विस्तार से चर्चा की गई है।

सातवां समुल्लास महत्वपूर्ण है जिसमें ईश्वर विषय, ईश्वर स्तुति, प्रार्थना व उपासना विषय, ईश्वर ज्ञान प्रकार, ईश्वर का अस्तित्व, ईश्वर के अवतार का निषेध, जीव की स्वतन्त्रता, ईश्वर व जीव की भिन्नता का वर्णन, ईश्वर के सगुण व निगुर्ण स्वरूप का वर्णन और वेद से संबंधित ऐसे विचार हैं जिनका ज्ञान अन्यत्र दुर्लभ व अप्राप्य है।

आठवें समुल्लास में प्रथम सृष्टि की उत्पत्ति आदि का विषय वर्णित है। अन्य विषयों में ईश्वर से भिन्न सृष्टि के उपादान कारण प्रकृति का वर्णन है। इसके बाद नास्तिक मतों का निराकरण भी किया गया है। मनुष्य इस सृष्टि की आदि में कब व कहां उत्पन्न हुए इसका वर्णन भी आठवें समुल्लास में है। ईश्वर द्वारा इस जगत को धारण करने आदि अनेक विषय भी इस आठवें समुल्लास में हैं।

नवें समुल्लास में विद्या अविद्या तथा बन्धन और मोक्ष का विषय वर्णित है।

दसवें समुल्लास में आचार-अनाचार विषय सहित भक्ष्य-अभक्ष्य विषय वर्णित हैं। इसके बाद चार समुल्लास और हैं जिनमें वेद से अन्य सभी मत मतान्तरों की मान्यताओं व सिद्धान्तों की सत्य मापदण्डों के आधार पर समीक्षा कर उनकी परीक्षा की गई है। सत्यार्थप्रकाश वस्तुतः वेद और मनुस्मृति के बाद महत्वपूर्ण धर्मग्रन्थ है और अन्य किसी धर्म ग्रन्थ की श्रेष्ठता में सत्यार्थप्रकाश से तुलना नहीं की जा सकती।

--मनमोहन कुमार आर्य

 

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