Swami Dhikshanand Saraswati Janm Sthabadi Samaroh

Swami Dhikshanand Saraswati Janm Sthabadi Samaroh organize by Samarpan Shodh Sansthan

10 Jun 2018
India
Samarpan Shodh Sansthan

स्वामी दीक्षानन्द सरस्वती जन्म शताब्दी समारोह सम्पन्न

10 जून 2018, दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा एवं समर्पण शोध संस्थान दिल्ली के तत्त्वावधान में आर्य जगत के दिक विद्वान मूर्धन्य आर्य संन्यासी, वृहद् यज्ञों के ब्रह्मा व लेखक विद्यामार्तण्ड स्वामी दीक्षानन्द सरस्वती के जन्म शताब्दी समारोह का भव्य आयोजन मावलंकर हाल, रफी मार्ग, नई दिल्ली में बड़ी धूमधाम से सम्पन्न हुआ। अपरान्ह् 3 बजे हाल प्रांगण में डा. धर्मेन्द्र शास्त्री जी के ब्रह्मत्व में यज्ञ आरम्भ हुआ जिसमें श्रीमती साधना व कर्नल रवि भटनागर, श्रीमती प्रभा निर्मल व श्री वेद भूषण, श्रीमती एवं श्री डा. कृष्ण लाल तथा श्रीमती व श्री शशिकान्त भण्डारी यजमान बने। पं. सत्यपाल पथिक जी के सानिं(य में यज्ञ सम्पन्न हुआ, सभी यजमानों ने आशीर्वाद व प्रसाद ग्रहण के परान्त समस्त धर्मप्रेमी, आर्यजन, गुरुकुलों से आये ब्रह्मचारी व मातृशक्ति सभागार में उपस्थित हुए। कार्यक्रम का शुभारम्भ श्रीमती सुकृति व श्री अविरल माथुर ने अपने सहयोगी श्री दीपक व श्री कुलविन्दर के सहयोग से मधुर संगीत के साथ वेद)चाओं  के अनुरूप प्रेरणाप्रद व कर्णप्रिय भजन प्रस्तुत किए जिनसे सभी आर्यजन मंत्र मुग्ध हो गए। तदुपरान्त पं. सत्यपाल पथिक जी ने स्वामी दीक्षानन्द जी के संस्मरण सुनाते हुए एक भजन श्राध्षी की कहानी सितारों से पूछो....’ प्रस्तुत किया। सुसज्जित मंच पर सभा अध्यक्ष स्वामी प्रणवानन्द जी, स्वामी विवेकानन्द जी ;गुरुकुल प्रभात आश्रमद्ध महाशय धर्मपाल ;चेयरमैन एम.डी.एच.द्ध, श्री योगेश मुंजाल ;म. डायरेक्टर मुंजाल शोवा लि.द्ध, श्री रामनाथ सहगल, श्री अजय सहगल, डा. गणेश दत्त, श्री दर्शन अग्निहोत्री ;वैदिक साधना आश्रमद्ध, श्री नवीन रहेजा ;रहेजा बिल्डर्सद्ध, आचार्य डा. वागीश जी, श्री आर्य तपस्वीजी, कर्नल डा. रवि भटनागर, श्री सतीश चड्डा, डा. धर्मेन्द्र जी व  ब्रह्मचारियों ;अखिल भारतीय दयानन्द सेवाश्रम संघद्ध द्वारा मंत्रोच्चारण के साथ संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलन किया। सभी मंचासीन महानुभावों ने जन्म शताब्दी समारोह पर आधारित स्मारिका का विमोचन संयुक्त रूप से किया व सभी को स्वामी जी का स्मृति चित्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। महाशय धर्मपाल जी, श्री योगेश मुंजाल जी, श्री राम नाथ सहगल श्री अजय सहगल, श्री नवीन रहेजा, श्री दर्शन अग्निहोत्री, पं. सत्यपाल पथिक जी, आचार्य डा. वागीश जी, डा. गणेश दत्त जी, डा. धर्मेन्द्र शास्त्री, श्री धर्मपाल आर्य प्रधान, श्री विनय आर्य, महामंत्री, श्री ओम प्रकाश आर्य, उपप्रधान, श्री शिव कुमार मदान, उपप्रधान , श्री विद्यामित्र ठुकराल, कोषाध्यक्ष, दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा, श्रीमती प्रेमलता भटनागर, श्री आर्य तपस्वी, श्री ओम प्रकाश यजुर्वेदी, दक्षिणी दिल्ली वेद प्रचार मण्डल, श्री बलदेव सचदेवा, पश्चिमी दिल्ली वेद प्रचार मण्डल, श्री कन्हैया लाल, उपप्रधान हरियाणा सभा, श्री हरिओम बंसल, मंत्री श्री एस.पी सिंह मंत्री, श्री सतीश चड्डा, महामंत्री, श्री अरुण प्रकाश वर्मा कोषाध्यक्ष, आर्य केन्द्रीय सभा, श्री सुनहरी लाल यादव व श्री चतर सिंह नागर, मंत्री, वेद प्रचार मण्डल, श्री यज्ञ देव शास्त्री, श्री यशपाल शास्त्री ;हल्द्वानीद्ध, श्री वेद प्रकाश शास्त्री ;साहिबाबादद्ध का सम्मान किया गया। मंच संचालन श्री सतीश चड्डा, श्री रमेश भटनागर, श्री राकेश भटनागर ने किया।  ब्र. प्रमोद ;प्रथमद्ध, ब्र. मनीष ;द्वितीयद्धतथा ब्र. अवधेश ;तृतीयद्ध को वेद के कंठस्थ होने के कारण ‘विद्यामण्र्तण स्वामी दीक्षानन्द सरस्वती’ स्मृति पुरस्कार हेतु 25 हजार रुपये की राशि प्रदान की गई। समारोह के मुख्य अतिथि श्री योगेश मुंजाल जी ने स्वामी जी के संस्मरणों को सुनाते हुए कहा, ‘स्वामी जी गलत यज्ञ विधियों को जरा भी स्वीकार नहीं करते थे व कहा करते थे कि केवल समिधाओं को होम करना ही यज्ञ नहीं है यदि व्यक्ति के अन्दर नम्रता, प्यार करने, झुकने की और दूसरों की सहायता करने की भावना हो तो यह भी यज्ञ हैं जो सबसे अधिक प्रभावी होते हैं। श्री मुंजाल जी ने बताया कि उन्होंने अपनी सभी फैक्ट्रियों की आधार शिला स्वामी जी से ही रखवाई। उन्होंने कहा कि स्वामी जी को सच्ची श्रधांजलि तब होगी जब उनके द्वारा स्थापित शोध संस्थान में शोधकार्य किये जाएं, उनके द्वारा लिखित पुस्तकों का प्रकाशन किया जाए तथा संस्थान गतिशील हो तथा उनके अधूरे कामों को पूरा किया जाए। समारोह अध्यक्ष स्वामी प्रणवानन्द जी ने अपने वक्तव्य में कहा ‘स्वामी जी कहा करते थे कि व्यक्ति के अन्दर 5 गुण होना आवश्यक है। 1 आप वस्त्र भले ही कैसे भी पहने पर साफ-सुथरे हो जो आपको शोभायमान हों, 2 व्यक्ति की वाणी मधुर हो क्योंकि बच्चे का जब अन्नप्राशन होता है तो उसकी जिव्हा पर सोने की श्लाखा से ओम लिखा जाता है, इसका तात्पर्य यही होता है कि वह बालक हमेशा मधुर बोले। 3 व्यक्ति की वार्तालाप शिष्ट होनी चाहिए। 4 व्यक्ति को विद्यावान होना चाहिए और 5 वां गुण व्यक्ति का स्वभाव विनयी होना चाहिए। हम समाज में ऐसे प्रेरणाप्रद कार्य करें जिससे हम लोगों के लिए भी स्वामी जी की तरह प्रेरणा स्रोत बनें।’ महाशय धर्मपाल जी ने अपने उद्बोधन में कहा ‘बच्छों वाली समाज हुआ करती थी लेकिन काम बड़े-बडे किया करती थी। आप भी बड़े-बड़े काम करते रहें। आर्य समाज के लिए मेरा योगदान हमेशा रहेगा। दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा महामंत्री श्री विनय आर्य ने स्वामी जी का संस्मरण सुनाते हुए कहा कि आर्य समाज मिण्टो रोड, सरकार की ओर से तोड़ा जा रहा था। किसी तरह स्वामी जी को खबर दी गयी, उन्होंने कहा मैं अभी पहुंचा और कुछ ही देर में स्वामी जी जोकि काफी दूर यज्ञ करा रहे थे मिण्टोरोड पहुंचे और यज्ञ करने लगे और फिर जो परिणाम हुआ आज आप सबके सामने है।’ श्री विनय आर्य ने आगे बताया कि ‘आज जबकि दिल्ली में आर्य महासम्मेलन-2018 होने जा रहा है, स्वामी जी की कमी बहुत प्रतीत हो रही है, आज हमंे यह सोचना पड़ रहा है कि महासम्मेलन में यज्ञ ब्रह्मा का निवेदन किसको किया जाए।’ डा. गणेश दत्त जी ने संस्मरणों की श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए कहा कि हम-सबको ईश्वर को बधाई देनी चाहिए कि उसने हमें भारत भूमि पर जन्म दिया। दूसरा सौभाग्य यह है कि हम आर्य समाज से जुड़े हैं, आर्य समाज से जुडे़ यानी स्वामी दीक्षानन्द जी से जुडे़, स्वामी दीक्षानन्द से जुड़े अर्थात् स्वामी दयानन्द सरस्वती जी से जुडे़, स्वामी दयानन्द जी से जुडे़ तो हम वेदों से जुडे़ हैं, वेदों के जुड़े हैं यानी विद्या से जुड़े हैं।’ उन्होंने कहा कि स्वामी जी कोई व्यक्ति नहीं थे वे एक संस्था थे। आज हम यहां स्वामी जी को श्रधांजलि देने के लिए एकत्र हुए हैं जबकि हम सब उन्हें शब्दांजलि दे रहे हैं, स्वामी जी के प्रति अपने भाव प्रकट कर रहे हैं तो भावांजलि है, गीत गा रहे हैं तो गीतांजलि है। श्रधांजलि कहते हैं किसी के जीवन के सत्य को, उसके आदर्शों को अंजुली में लेकर अर्पण करना। समारोह के मुख्य वक्ता आचार्य डा. वागीश जी ने स्वामी जी के साथ बिताए क्षणों की विस्तार से चर्चा की। डा. वागीश जी ने बतलाया कि बम्बई में आर्य समाज की स्थापना में बाला साहेब ठाकरे आए हुए थे उन्होंने स्वामी जी का प्रवचन सुनकर कहा कि मुझे ऐसा लग रहा था कि मेरे सामने कोई प्राचीन )षि, सन्यासी बैठा हो।’  विश्व पुस्तक मेले का संस्मरण  सुनाते हुए कहा कि मैं और मेरे एक अन्य मित्र और स्वामी जी दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में गये वहां से कुछ पुस्तकें खरीदीं उन सारी पुस्तकों की पेमेंट स्वामी जी ने की। मेले से निकलकर हम लोग बस के इन्तजार में काफी देर से खड़े हाथों में पुस्तकों के थैले थे वजन अधिक था सो हम लोगों ने वे थैले सड़क की रेलिंग जिसमें शूल से बने थे उन पर टांग दिया जैसे ही थैले टांगे कि बस आ गयी और हम सब बस में चढ़ गये। कुछ दूर जाने पर मेरी निगाह स्वामी जी के हाथ पर तथा अपने साथी के हाथ पर गई तो देखा थैले किसी के पास नहीं थे। मैंने स्वामी जी से कहा थैले वहीं टंगे रह गये अब तो सारी पुस्तकें गयीं! स्वामी जी अगले स्टाप पर उतर गये हम लोग भी उतर गये बोले जाओ जवानों भाग कर जाओ थैले वहीं मिलेंगे। हमने कहा स्वामी जी दिल्ली में थैले अब वहां कहां मिलेंगे। स्वामी बोले पुस्तकों की पेमेन्ट मैंने की है मेरी कमाई ईमानदारी की है। अगर मेरी कमाई ईमानदारी की होगी तो थैले वहीं मिलेंगे। हम दोनों वहां गये तो वास्तव में थैले वैसे के वैसे ही वहां रेलिंग पर टंगे थे। ये विश्वास था स्वामी जी को अपने ऊपर।’ श्री नवीन रहेजा जी ने अनुरोध किया कि यदि किसी के पास स्वामी जी द्वारा कोई प्रकाशन हो तो उसे मैं व हमारा परिवार प्रकाशित करावा कर उनके अधूरे कार्यों को पूर्ण करने का प्रयास करूंगा। समर्पण शोध संस्थान की ओर से स्वामी जी पर बनाया गया वृत्तचित्र का प्रदर्शन किया गया। कार्यक्रम को सफल बनाने एवं व्यवस्थाओं को पूर्ण करने में श्री अरुण प्रकाश वर्मा, श्री एस. पी. सिंह, डा. मुकेश आर्य, श्री संदीप आर्य, श्री विपिन भल्ला जी, श्री बृजेश आर्य व श्रीमती हर्ष आर्य और प्रभा आर्य का विशेष सहयोग रहा। समारोह के अन्त में प्रीतिभोज का आनन्द लिया गया।

 

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