अग?निहोत?र विधि

दैनिक यज?ञ

||अथ अग?निहोत?रमंत?र:||

जल से आचमन करने के मंत?र

 

इससे पहला

? अमृतोपस?तरणमसि स?वाहा ।१।

 

इससे दूसरा

? अमृतापिधानमसि स?वाहा ।२।

 

इससे तीसरा

? सत?यं यश: श?रीर?मयि श?री: श?रयतां स?वाहा ।३।

 

मंत?रार?थ – हे सर?वरक?षक अमर परमेश?वर! यह स?खप?रद जल प?राणियों का आश?रयभूत है, यह हमारा कथन श?भ हो। यह मैं सत?यनिष?ठापूर?वक मानकर कहता हू? और स?ष?ठूक?रिया आचमन के सदृश आपको अपने अंत:करण में ग?रहण करता हू?।।1।।

हे सर?वरक?षक अविनाशिस?वरूप, अजर परमेश?वर! आप हमारे आच?छादक वस?त?र के समान अर?थात सदा-सर?वदा सब और से रक?षक हों, यह सत?यवचन मैं सत?यनिष?ठापूर?वक मानकर कहता हू? और स?ष?ठूक?रिया आचमन के सदृश आपको अपने अंत:करण में ग?रहण करता हू?।।2।।

हे सर?वरक?षक ईश?वर सत?याचरण, यश ?वं प?रतिष?ठा. विजयलक?ष?मी, शोभा धन-?श?वर?य म??मे स?थित हों, यह मैं सत?यनिष?ठापूर?वक प?रार?थना करता हू? और स?ष?ठूक?रिया आचमन के सदृश आपको अपने अंत:करण में ग?रहण करता हू?।।3।।

 

जल से अंग स?पर?श करने के मंत?र

 

इसका प?रयोजन है-शरीर के सभी महत?त?वपूर?ण अंगों में पवित?रता का समावेश तथा अंतः की चेतना को जगाना ताकि यज?ञ जैसा श?रेष?ठ कृत?य किया जा सके । बा?? हाथ की हथेली में जल लेकर दाहिने हाथ की उ?गलियों को उनमें भिगोकर बता? ग? स?थान को मंत?रोच?चार के साथ स?पर?श करें ।

 

इस मंत?र से म?ख का स?पर?श करें

? वाङ?म आस?येऽस?त? ॥

 

इस मंत?र से नासिका के दोनों भाग

? नसोर?मे प?राणोऽस?त? ॥

 

इससे दोनों आ?खें

? अक?ष?णोर?मे चक?ष?रस?त? ॥

 

इससे दोनों कान

? कर?णयोर?मे श?रोत?रमस?त? ॥

 

इससे दोनों भ?जा?ं

? बाह?वोर?मे बलमस?त? ॥

 

इससे दोनों जंघा?ं

? ऊर?वोर?म ओजोऽस?त? ॥

 

इससे सारे शरीर पर जल का मार?जन करें

? अरिष?टानि मेऽङ?गानि तनूस?तन?वा में सह सन?त? ॥

 

मंत?रार?थ – हे रक?षक परमेश?वर! मैं आपसे प?रार?थना करता हू? कि मेरे म?ख में वाक? इन?द?रिय पूर?ण आय?पर?यन?त स?वास?थ?य ?वं सामर?थ?य सहित विद?यमान रहे।

हे रक?षक परमेश?वर! मेरे दोनों नासिका भागों में प?राणशक?ति पूर?ण आय?पर?यन?त स?वास?थ?य ?वं सामर?थ?यसहित विद?यमान रहे।

हे रक?षक परमेश?वर! मेरे दोनों आखों में दृष?टिशक?ति पूर?ण आय?पर?यन?त स?वास?थ?य ?वं सामर?थ?यसहित विद?यमान रहे।

हे रक?षक परमेश?वर! मेरे दोनों कानों में स?नने की शक?ति पूर?ण आय?पर?यन?त स?वास?थ?य ?वं सामर?थ?यसहित विद?यमान रहे।

हे रक?षक परमेश?वर! मेरी भ?जाओं में पूर?ण आय?पर?यन?त बल विद?यमान रहे।

हे रक?षक परमेश?वर! मेरी जंघाओं में बल-पराक?रम सहित सामर?थ?य पूर?ण आय?पर?यन?त विद?यमान रहे।

हे रक?षक परमेश?वर! मेरा शरीर और अंग-प?रत?यंग रोग ?वं दोष रहित बने रहें, ये अंग-प?रत?यंग मेरे शरीर के साथ सम?यक? प?रकार संय?क?त ह?? सामर?थ?य सहित विद?यमान रहें।

 

ईश?वर की स?त?ति - प?रार?थना – उपासना के मंत?र

 

? विश?वानी देव सवितर?द?रितानि परास?व ।
यद भद?रं तन?न आ स?व ॥१॥

 

मंत?रार?थ – हे सब स?खों के दाता ज?ञान के प?रकाशक सकल जगत के उत?पत?तिकर?ता ?वं समग?र ?श?वर?यय?क?त परमेश?वर! आप हमारे सम?पूर?ण द?र?ग?णों, द?र?व?यसनों और द?खों को दूर कर दीजि?, और जो कल?याणकारक ग?ण, कर?म, स?वभाव, स?ख और पदार?थ हैं, उसको हमें भलीभांति प?राप?त कराइये।

 

हिरण?यगर?भ: समवर?त?तताग?रे भूतस?य जात: पतिरेक आसीत? ।
स दाघार पृथिवीं द?याम?तेमां कस?मै देवाय हविषा विधेम ॥२॥

 

मंत?रार?थ – सृष?टि के उत?पन?न होने से पूर?व और सृष?टि रचना के आरम?भ में स?वप?रकाशस?वरूप और जिसने प?रकाशय?क?त सूर?य, चन?द?र, तारे, ग?रह-उपग?रह आदि पदार?थों को उत?पन?न करके अपने अन?दर धारण कर रखा है, वह परमात?मा सम?यक? रूप से वर?तमान था। वही उत?पन?न ह?? सम?पूर?ण जगत का प?रसिद?ध स?वामी केवल अकेला ?क ही था। उसी परमात?मा ने इस पृथ?वीलोक और द?य?लोक आदि को धारण किया ह?आ है, हम लोग उस स?खस?वरूप, सृष?टिपालक, श?द?ध ?वं प?रकाश-दिव?य-सामर?थ?य य?क?त परमात?मा की प?राप?ति के लिये ग?रहण करने योग?य योगाभ?यास व हव?य पदार?थों द?वारा विशेष भक?ति करते हैं।

 

य आत?मदा बलदा यस?य विश?व उपासते प?रशिषं यस?य देवा: ।
यस?य छायाऽमृतं यस?य मृत?य?: कस?मै देवाय हविषा विधेम ॥३॥

 

मंत?रार?थ – जो परमात?मा आत?मज?ञान का दाता शारीरिक, आत?मिक और सामाजिक बल का देने वाला है, जिसकी सब विद?वान लोग उपासना करते हैं, जिसकी शासन, व?यवस?था, शिक?षा को सभी मानते हैं, जिसका आश?रय ही मोक?षस?खदायक है, और जिसको न मानना अर?थात भक?ति न करना मृत?य? आदि कष?ट का हेत? है, हम लोग उस स?खस?वरूप ?वं प?रजापालक श?द?ध ?वं प?रकाशस?वरूप, दिव?य सामर?थ?य य?क?त परमात?मा की प?राप?ति के लिये ग?रहण करने योग?य योगाभ?यास व हव?य पदार?थों द?वारा विशेष भक?ति करते हैं।

 

य: प?राणतो निमिषतो महित?वैक इन?द?राजा जगतो बभूव।
य ईशे अस?य द?विपदश?चत?ष?पद: कस?मै देवाय हविषा विधेम ॥४॥

 

मंत?रार?थ – जो प?राणधारी चेतन और अप?राणधारी जड जगत का अपनी अनंत महिमा के कारण ?क अकेला ही सर?वोपरी विराजमान राजा ह?आ है, जो इस दो पैरों वाले मन?ष?य आदि और चार पैरों वाले पश? आदि प?राणियों की रचना करता है और उनका सर?वोपरी स?वामी है, हम लोग उस स?खस?वरूप ?वं प?रजापालक श?द?ध ?वं प?रकाशस?वरूप, दिव?यसामर?थ?यय?क?त परमात?मा की प?रप?ति के लिये योगाभ?यास ?वं हव?य पदार?थों द?वारा विशेष भक?ति करते हैं ।

 

येन द?यौर?ग?रा पृथिवी च द?रढा येन स?व: स?तभितं येन नाक: ।
यो अन?तरिक?षे रजसो विमान: कस?मै देवाय हविषा विधेम ॥५॥

 

मंत?रार?थ – जिस परमात?मा ने तेजोमय द?य?लोक में स?थित सूर?य आदि को और पृथिवी को धारण कर रखा है, जिसने समस?त स?खों को धारण कर रखा है, जिसने मोक?ष को धारण कर रखा है, जो अंतरिक?ष में स?थित समस?त लोक-लोकान?तरों आदि का विशेष नियम से निर?माता धारणकर?ता, व?यवस?थापक ?वं व?याप?तकर?ता है, हम लोग उस श?द?ध ?वं प?रकाशस?वरूप, दिव?यसामर?थ?यय?क?त परमात?मा की प?रप?ति के लिये ग?रहण करने योग?य योगाभ?यास ?वं हव?य पदार?थों द?वारा विशेष भक?ति करते हैं ।

 

प?रजापते न त?वदेतान?यन?यो विश?वा जातानि परिता बभूव ।
यत?कामास?ते ज?ह?मस?तनो अस?त? वयं स?याम पतयो रयीणाम? ॥६॥

 

मंत?रार?थ – हे सब प?रजाओं के पालक स?वामी परमत?मन! आपसे भिन?न दूसरा कोई उन और इन अर?थात दूर और पास स?थित समस?त उत?पन?न ह?? जड-चेतन पदार?थों को वशीभूत नहीं कर सकता, केवल आप ही इस जगत को वशीभूत रखने में समर?थ हैं। जिस-जिस पदार?थ की कामना वाले हम लोग अपकी योगाभ?यास, भक?ति और हव?यपदार?थों से स?त?ति-प?रार?थना-उपासना करें उस-उस पदार?थ की हमारी कामना सिद?ध होवे, जिससे की हम उपासक लोग धन-?श?वर?यों के स?वामी होवें ।

 

स नो बन?ध?र?जनिता स विधाता धामानि वेद भ?वनानि विश?वा।
यत?र देवा अमृतमानशाना स?तृतीये घामन?नध?यैरयन?त ॥७॥

 

मंत?रार?थ – वह परमात?मा हमारा भाई और सम?बन?धी के समान सहायक है, सकल जगत का उत?पादक है, वही सब कामों को पूर?ण करने वाला है। वह समस?त लोक-लोकान?तरों को, स?थान-स?थान को जानता है। यह वही परमात?मा है जिसके आश?रय में योगीजन मोक?ष को प?राप?त करते ह??, मोक?षानन?द का सेवन करते ह?? तीसरे धाम अर?थात परब?रह?म परमात?मा के आश?रय से प?राप?त मोक?षानन?द में स?वेच?छापूर?वक विचरण करते हैं। उसी परमात?मा की हम भक?ति करते हैं।

 

अग?ने नय स?पथा राय अस?मान? विश?वानि देव वय?नानि विद?वान।
य?योध?यस?मज?ज?ह?राणमेनो भूयिष?ठां ते नम उक?तिं विधे?म ॥८॥

 

मंत?रार?थ – हे ज?ञानप?रकाशस?वरूप, सन?मार?गप?रदर?शक, दिव?यसामर?थय?क?त परमात?मन! हमें ज?ञान-विज?ञान, ?श?वर?य आदि की प?राप?ति कराने के लिये धर?मय?क?त, कल?याणकारी मार?ग से ले चल। आप समस?त ज?ञानों और कर?मों को जानने वाले हैं। हमसे क?टिलताय?क?त पापरूप कर?म को दूर कीजिये । इस हेत? से हम आपकी विविध प?रकार की और अधिकाधिक स?त?ति-प?रार?थना-उपासना सत?कार व नम?रतापूर?वक करते हैं।

 

दीपक जलाने का मंत?र

 

? भूर?भ?व: स?व: ॥

 

मंत?रार?थ – हे सर?वरक?षक परमेश?वर! आप सब के उत?पादक, प?राणाधार सब द?:खों को दूर करने वाले स?खस?वरूप ?वं स?खदाता हैं। आपकी कृपा से मेरा यह अन?ष?ठान सफल होवे। अथवा हे ईश?वर आप सत,चित?त, आनन?दस?वरूप हैं। आपकी कृपा से यह यज?ञीय अग?नि पृथिवीलोक में, अन?तरिक?ष में, द?य?लोक में विस?तीर?ण होकर लोकोपकारक सिद?ध होवे।

 

यज?ञ क?ण?ड में अग?नि स?थापित करने का मंत?र

 

? भूर?भ?व: स?वर?द?यौरिव भूम?ना पृथिवीव वरिम?णा ।
तस?यास?ते पृथिवि देवयजनि पृष?ठेऽग?निमन?नादमन?नाद?यायादधे ॥

 

मंत?रार?थ – हे सर?वरक?षक सबके उत?पादक और प?राणाधार द?खविनाशक स?खस?वरूप ?वं स?खप?रदाता परमेश?वर! आपकी कृपा से मैं महत?ता या गरिमा में द?य?लोक के समान, श?रेष?ठता या विस?तार में पृथिवी लोक के समान हो जाऊं । देवयज?ञ की आधारभूमि पृथिवी! के तल पर हव?य द?रव?यों का भक?षण करने वाली यज?ञीय अग?नि को, भक?षणीय अन?न ?वं धर?मान?कूल भोगों की प?राप?ति के लि? तथा भक?षण सामर?थ?य और भोग सामर?थ?य प?राप?ति के लि? यज?ञक?ण?ड में स?थापित करता हू? ।

 

अग?नि प?रदीप?त करने का मंत?र

 

? उद? ब?ध?यस?वाग?ने प?रतिजागृहित?व?मिष?टापूर?ते सं सृजेथामयं च ।
अस?मिन?त?सधस?थे अध?य?त?तरस?मिन? विश?वे देवा यजमानश?च सीदत ॥

 

मंत?रार?थ – मैं सर?वरक?षक परमेश?वर का स?मरण करता ह?अ यहा? कामना करता हू? कि हे यज?ञाग?ने ! तू भलीभांति उद?दीप?त हो, और प?रत?येक समिधा को प?रज?वलित करती ह?ई पर?याप?त ज?वालामयी हो जा। तू और यह यजमान इष?ट और पूर?त?त कर?मों को मिल?कर सम?पादित करें। इस अति उत?कृष?ट, भव?य और अत?य?च?च यज?ञशाला में सब विद?वान और यज?ञकर?त?ता जन मिलकर बैठें।

 

घृत की तीन समिधायें रखने के मंत?र

 

इस मंत?र से प?रथम समिधा रखें।

? अयन?त इध?म आत?मा जातवेदस?तेनेध?यस?व वर?द?धस?व चेद?ध वर?धयचास?मान? प?रजयापश?भिर?ब?रह?मवर?चसेनान?नाद?येन समेधय स?वाहा । इदमग?नेय जातवेदसे – इदं न मम ॥१॥

 

मन?त?रार?थ- मैं सर?वरक?षक परमेश?वर का स?मरण करता ह?आ कामना करता हू? कि हे सब उत?पन?न पदार?थों के प?रकाशक अग?नि! यह समिधा तेरे जीवन का हेत? है ज?वलित रहने का आधार है।उस समिधा से तू प?रदीप?त हो, सबको प?रकाशित कर और सब को यज?ञीय लाभों से लाभान?वित कर, और हमें संतान से, पश? सम?पित?त से बढ़ा।ब?रह?मतेज ( विद?या, ब?रह?मचर?य ?वं अध?यात?मिक तेज से, और अन?नादि धन-?श?वयर? तथा भक?षण ?वं भोग- सामथ?यर? से समृद?ध कर। मैं त?यागभाव से यह समिधा- हवि प?रदान करना चाहता हू? | यह आह?ति जातवेदस संज?ञक अग?नि के लि? है, यह मेरी नही है ||1||

 

इन दो मन?त?रों से दूसरी समिधा रखें

ओं समिधाग?निं द?वस?यत घृतैर?बोधयतातिथम? |
आस?मिन हव?या ज?होतन स?वाहा | इदमग?नये इदन?न मम ||२||

 

मन?त?रार?थ- मैं सर?वरक?षक परमेश?वर का स?मरण करते ह?? वेद के आदेश का कथन करता हू? कि हे मन?ष?यो! समिधा के द?वारा यज?ञाग?नि की सेवा करो -भक?ति से यज?ञ करो।घृताह?तियों से गतिशील ?वं अतिथ के समान प?रथम सत?करणीय यज?ञाग?नि को प?रब?द?ध करो, इसमें हव?यों को भलीभांति अपिर?त करो।मैं त?यागभाव से यह समिधा- हवि प?रदान करना चाहता हू?। यह आह?ति यज?ञाग?नि के लि? है, यह मेरी नहीं है ||२||

 

स?समिद?धाय शोचिषे घृतं तीव?रं ज?होतन अग?नये जातवेदसे स?वाहा।
इदमग?नये जातवेदसे इदन?न मम ||३||

 

मन?त?रार?थ- मैं सर?वरक?षक परमेश?वर के स?मरणपूर?वक वेद के आदेश का कथन करता हू? कि हे मन?ष?यों! अच?छी प?रकार प?रदीप?त ज?वालाय?क?त जातवेदस? संज?ञक अग?नि के लि? वस?त?मात?र में व?याप?त ?वं उनकी प?रकाशक अग?नि के लि? उत?कृष?ट घृत की आह?तिया? दो . मैं त?याग भाव से समिधा की आह?ति प?रदान करता हू? यह आह?ति जातवेदस? संज?ञक माध?यमिक अग?नि के लि? है यह मेरी नहीं।।३।। इस मन?त?र से तीसरी समिधा रखें।

 

तन?त?वा समिदि?भरङि?गरो घृतेन वर?द?धयामसि ।
बृहच?छोचा यविष?ठय स?वाहा।।इदमग?नेऽङिगरसे इदं न मम।।४।।

 

मन?त?रार?थ - मैं सर?वरक?षक परमेश?वर का स?मरण करते ह?? यह कथन करता हू? कि हे तीव?र प?रज?वलित यज?ञाग?नि! त??े हम समिधायों से और धृताह?तियों से बढ़ाते हैं।हे पदार?थों को मिलाने और पृथक करने की महान शक?ति से सम?पन?न अग?नि ! तू बह?त अधिक प?रदीप?त हो, मैं त?यागभाव से समिधा की आह?ति प?रदान करता हू? ।यह अंगिरस संज?ञक पृथिवीस?थ अग?नि के लि? है यह मेरी नहीं है।

 

नीचे लिखे मन?त?र से घृत की पांच आह?ति देवें

 

ओम? अयं त इध?म आत?मा जातवेदस?तेनेध?यस?व वद?धर?स?व चेद?ध वधर?य चास?मान? प?रजयापश?भिब?रह?मवर?चसेनान?नाद?येन समेधय स?वाहा।इदमग?नये जातवेदसे - इदं न मम।।१।।

 

मन?त?रार?थ- मैं सर?वरक?षक परमेश?वर का स?मरण करता ह?आ कामना करता हू? कि हे सब उत?पन?न पदार?थों के प?रकाशक अग?नि! यह धृत जो जीवन का हेत? है ज?वलित रहने का आधार है।उस धृत से तू प?रदीप?त हो और ज?वालाओं से बढ़ तथा सबको प?रकाशित कर = सब को यज?ञीय लाभों से लाभान?वित कर और हमें संतान से, पश? सम?पित?त से बढ़ा। विद?या, ब?रह?मचर?य ?वं आध?यात?मिक तेज से, और अन?नादि धन ?श?वर?य तथा भक?षण ?वं भोग सामर?थ?य से समृद?ध कर। मैं त?यागभाव से यह धृत प?रदान करता हू? ।यह आह?ति जातवेदस संज?ञक अग?नि के लि? है, यह मेरी नहीं है| ||१||

 

जल - प?रसेचन के मन?त?र

 

इस मन?त?र से पूर?व में

ओम? अदितेऽन?मन?यस?व।।

 

मन?त?रार?थ- हे सर?वरक?षक अखण?ड परमेश?वर! मेरे इस यज?ञकर?म का अन?मोदन कर अर?थात मेरा यह यज?ञान?ष?ठान अखिण?डत रूप से सम?पन?न होता रहे।अथवा, पूर?व दिशा में, जलसिञ?चन के सदृश, मैं यज?ञीय पवित?र भावनाओं का प?रचार प?रसार निबार?ध रूप से कर सकू?, इस कार?य में मेरी सहायता कीजिये।

 

इससे पश?चिम में

ओम? अन?मतेऽन?मन?यस?व।।

 

मन?त?रार?थ- हे सर?वरक?षक यज?ञीय ?वं ईश?वरीय संस?कारों के अन?कूल ब?द?धि बनाने में समर?थ परमात?मन! मेरे इस यज?ञकर?म का अन?कूलता से अन?मोदन कर अर?थात यह यज?ञन?ष?ठान आप की कृपा से सम?पन?न होता रहे।अथवा, पश?चिम दिशा में जल सिञ?चन के सदृश मैं यज?ञीय पवित?र भावनाओं का प?रचार-प?रसार आपकी कृपा से कर सकूं, इस कार?य में मेरी सहायता कीजिये।

 

इससे उत?तर में

ओम? सरस?वत?यन?मन?यस?व।।

 

मन?त?रार?थ-हे सर?वरक?षक प?रशस?त ज?ञानस?वरूप ?वं ज?ञानदाता परमेश?वर! मेरे इस यज?ञकर?म का अन?मोदन कर अर?थात आप द?वारा प?रदत?त उत?तम ब?द?वि से मेरा यह यज?ञन?ष?ठान सम?यक विधि से सम?पन?न होता रहे।अथवा, उत?तर दिशा में जलसिञ?चन के सदृश मैं यज?ञीय ज?ञान का प?रचार-प?रसार आपकी कृपा से करता रहू?, इस कार?य में मेरी सहायता कीजिये।

 

और - इस मन?त?र से वेदी के चारों और जल छिड़कावें।

ओं देव सवितः प?रस?व यज?ञं प?रस?व यज?ञपतिं भगाय।दिव?यो
गन?धर?वः केतपूः केतं नः प?नात? वाचस?पतिर?वाचं नः स?वदत?।।

 

मन?त?रार?थ-- हे सर?वरक?षक दिव?यग?ण शक?