विकासवाद का सिदधानत संसार में से समय पर आया जब विजञान विकासशील अवसथा में था। विकासवाद का सिदधानत इंगलैणड में जनमें चारलस राबरट डारविन (जनम 12 फरवरी, 1809 तथा मृतय 19 अपरैल, 1882) ने दिया। इसका आधार कया था? इसका उततर यही है कि उनकी कलपनायें, विचार, चिनतन, सृषटि की उतपतति का अधययन, व उनके अपने निषकरष। वह यह तो जानते थे कि यह सृषटि हमेशा से इसी रूप में विदयमान नहीं है अपित इतिहास की दृषटि से हजारों, लाखों व उससे भी पूरव बनी है परनत कब व कैसे बनी इसका कोई विजञान व बदधि संगत ठोस सिदधानत न तो उस समय के साहितय अथवा बाइबिल में ही उपलबध था और न कहीं अनयतर, अतः उनहोंने व उनके सभी समकालीन पशचिमी विदवानों ने बाइबिल के परिपरेकषय में कलपनायें की। वैदिक मत के सतय को सवीकार करना उनहें अभिपरेत नहीं था अनयथा उनके धारमिक सिदधानतों को खतरा होता। शरी डारविन भारत आये नहीं और भारत में जो वैदिक साहितय जिसमें वेद और दरशन भी शामिल है, उससे वह अनभिजञ थे अथवा उनहोंने सोच-मसकर उसकी उपेकषा की। यह आशचरय की बात है कि उनके जनम के ठीक 16 वरष बाद गजरात की धरती में टंकारा नामक गराम में क औदिचय बराहमण कल में बालक मूलशंकर जो बाद में महरषि दयाननद के नाम से परसिदध ह, जनम हआ। महरषि दयाननद ने अपने शैशव काल में अपने परिवार में जब तरक व बदधि की तला पर सम में न आने वाली मूरतिपूजा आदि धारमिक परमपराओं को देखा व समा तो उनहोंने उन मानयताओं के विरूदध क परकार का विदरोह कर दिया और सतय, जञान व विजञान की खोज में घर से निकल पड़े। महरषि दयाननद ने भी इस सृषटि की उतपतति के सिदधानत का वेदों व वैदिक साहितय के आलोक में अधययन किया और सन 1863 व उसके बाद अनेक अवसरों पर उनहोंने अपने गरनथों, सनधया, सतयारथ परकाश वं ऋगवेदादिभाषय भूमिका, वारतालाप, शासतरारथ आदि के माधयम से सृषटि विजञान का सवरूप परसतत किया जो बदधिसंगत, तरकसंगत, अकाटय होने के साथ जञान व विजञान की कसौटी पर भी खरा है।

हम पहले महरषि दयाननद के सिदधानत को जान लेते हैं। महरषि दयाननद के अनसार जगत में 3 पदारथों का असतितव सदा-सरवदा, अनादिकाल से है जिनहें ईशवर, जीव व परकृति के नाम से जाना जाता है और यह तीनों नाम हमें शाशवत दैवीय साहितय ‘वेद’से मिले हैं। इसमें ईशवर व जीव तो चेतन पदारथ हैं जबकि परकृति जड़, अचेतन अथवा निरजीव पदारथ या ततव है। सृषटि की रचना से पूरव यह परकृति कारण अवसथा में होती है जो अतयनत सूकषम कणों, जो ऊरजा के कण हैं, सतव, रज व तम इन परकृति के गणों की सामयावसथा है। यह सृषटि निरमाण की सामगरी है। इस परकृति में ही उननति, विकास, सवयं नहीं अपित ईशवर के दवारा, होकर यह कारय सृषटि या सारा जगत जिसमें सूरय, चनदर, पृथिवी, अनेकानेक गरह व उपगरह, नकषतर, आकाश गंगां, निहारिकायें, अगनि, जल, वाय और आकाश आदि हैं, बनते हैं। परशन मातर यह है कि कया यह अपने आप बने हैं या इनहें किसी ने बनाया है। विजञान का क नियम है कि परतयेक करिया की परतिकरिया होती है। अतः परतिकरिया के पीछे करिया और करिया के पीछे क चेतन करता का होना आवशयक है अनयथा करिया का होना असमभव है। इसे आप इस परकार से सम लें कि रोटी के बनाने का सारा सामान या सामगरी रसोई गृह में उपलबध है। इन सब सामान से क दिन, महीने, क वरष या अनेकों वरषों में भी अपने आप रोटी नहीं बन सकती। रोटी कब बनेगी जब क चेतन सतता, मनषय, सतरी वा परूष, जो रोटी बनाना जानता है, वह उचित मातरा में रोटी बनाने के लि आवशयक सामगरी लेकर विधि पूरवक या जञानपूरवक रोटी को बना दें। तभी रोटी बनेगी अनयथा कभी नहीं बन सकती। इसी परकार कारण परकृति से कारय परकृति अरथात सूरय, चनदर व पृथिवी आदि क चेतन सतता के दवारा ही बनायें गये हैं। सा ही वरणन वेदों में है और इसी सिदधानत को वेद और वैदिक गरनथों के आघार पर सवामी दयाननद जी ने सविसतार व सयकतिक परसतत किया है। महरषि दयाननद जी को तो वेद और वैदिक साहितय सृषटि रचना व उसकी उतपतति के सिदधानत को परतिपादित करने के लि मिल गये और उनहोंने विजञान की नीति व रीति से सृषटि रचना के सिदधानत का परतिपादन कर दिया परनत चारलस डारविन सहित पशचिम जगत के अनय विदवानों के पास वेदों का जञान नहीं था अतः उनहें कलपनायें करनी पड़ी और वह कलपनायें सतय व यथारथ से विरूदध, उससे हटकर व अटपटी सी, जञान व बदधि तथा तरकहीन सी उनहोंने परसतत की। पशचिमी जगत को वेदों का सिदधानत पता नहीं था अतः वहां के लोगों व वैजञानिकों ने चारलस डारविन की मानयता को वैजञानिक सिदधानत मान लिया जबकि यह सतय के पूरणतया विपरीत था व है। आज भी इसको निरभरानत सिदध नहीं किया जा सका है। इससे पता चलता है कि कई बार बड़े बड़े जञानी, विदवान व वैजञानिक भी गलत बात को सवीकार कर लेते हैं जबकि वह तरक व परमाणों से पूरी तरह से सिदध नहीं होती हैं। परनत खेद इस बात का है कि वैजञानिक अपनी बात व मानयता की सतत खोज करते रहते हैं और उसे अनतिम परिणाम पर पहंचाते हैं परनत हमारे विदेशी वैजञानिक बनधओं ने सृषटि उतपतति व रचना के वैदिक सिदधानत की भली-भांति परीकषा करना उचित नहीं समा, यह चिनतनीय है। सा उनहोंने कयों किया इससे भरानति व भरमों को आशरय मिलता है। इसका क कारण उनकी भारत विरोधी धारणा भी परतीत होती है। जब अपने देश के लोग ही विदेशियों का अनधानकरण करें तो विदेशी वैजञानिक, समाज शासतरी व धरमवेतता भी भारतीय वेदों के सतय सिदधानतों की उपेकषा करें, तो इसमें आशचरय कैसा?

विकासवाद कया है? विकासवाद शबद पृथिवी वं जैविक रचना या उतपतति व उसके विकास अथवा उननति के लि परयोग होता है। विकासवाद के सिदधानत के जनक चारलस  राबरट डारविन महाशय है। डारविन क वैजञानिक थे। उनहोंने जड़ वं जैविक सृषटि की रचना व उतपतति पर विचार किया। उनके जञान में बाइबिल के सिदधानत अवशय विदयमान थे जो विजञान के अनकूल व अनरूप नहीं थे। उनहोंने अनमान से कारय लिया और सोचा कि इस बरहमाणड को बनाने वाला तो कोई दिखाई नहीं देता और न वह उनकी बदधि में ही आ सका, अतः सवाभाविक था कि उनहोंने सृषटि को सवतः, सवयं, अपने आप निरमित मान लिया और कहा कि धीरे-धीरे, करमिक रूप से, सवतः विकास होता है और यह बरहमाणड और जैविक सृषटि असतितव में आ जाती है। हमारा मानना है कि यदि सृषटि की आदि में भारत में ईशवर ने आदि चार ऋषियों को वेदों का जञान न दिया होता तो हमारे पूरवजों को भी काफी मशककत करनी पड़ती और वेदों के आधार पर जो सिदधानत हमारे सामने तब आये और आज भी विदयमान हैं, वह कदापि न होते। भारत का बचचा-बचचा कभी वेदों की शिकषा के अनसार यह जानता व मानता था कि ईशवर निराकार, सरववयापक, नितय, अनादि, अजनमा, अननत, अमर, जीवातमा का पिता-माता-आचारय-राजा और गरू है, उसने जीवों को पूरव जनमों के आधार पर उनके सख व दख रूपी करमों के फलों के लि ही अपनी सामरथय के साफलय व जीवों के सख के लि इस सृषटि की रचना की है। यदि डारविन ने परयास किया होता तो वह कम से कम मनसमृति को ही परापत कर सृषटि की रचना के वैदिक सिदधानत को जान सकते थे, और तब यदि वह पकषपात न करते तो ईशवर का सवरूप भी उनहें सम में आ जाता और सृषटि की उतपतति से जड़े ह सभी परशनों के सनतोषजनक उततर उनहें मिल जाते। भारत में उनके देश की सरकार थी और इंगलैणड में परो. फरेडरिक मैकसमूलर आदि अनेक वेदों के जानकर मौजूद थे जिनसे वह जानकारी ले सकते थे व सवयं भारत भी आ सकते थे। क वैजञानिक होकर उनहोंने यह कारय कयों नहीं किया? यह आशचारयजनक है और सनदेह व शक पैदा करता है। इससे यह भी संकेत मिलता था कि उनहोंने सतय की खोज करने के लि परयापत परयास नहीं कि। सी ही शिकायत हमें देश व विदेश के वैजञानिकों से भी होती है। हमारे पशचिमी वैजञानिकों ने जड़ परकृति का अधययन किया व अनेकानेक नियमों को खोज निकाला, उनहें विजञान व गणित के माधयम से परसतत किया जिससे आज हम विजञान के शिखर पर पहंच गये हैं। हम सभी वैजञानिकों का उनकी खोजों व आविषकारों तथा अनेकानेक कमपयूटर, सूचना के यनतर आदि उपकरण परदान करने के लि उनहें साधवाद भी देना चाहते हैं परनत हमें उन वैजञानिकों पर आशचरय होता है जो परमाण बनाने वाली अदृशय कारण सतता ईशवर जो क निराकार ततव है, उसका संकेत मिलने पर भी उसे सवीकार नहीं करते। कया इलेकटरान परोटोन, व नयूटरॉन आदि परकृति के (सत, रज व तम गणों) में सवयं परसपर नाना परकार के हाइडरोजन, हीलियम व अनय सभी ततव वा सूरय, चनदर, नकषतरों व पृथिवी वं पृथिवीसथ पदारथ बनाने की कषमता है? यदि नहीं है, कदापि नहीं है, तो फिर या तो वह इसका सनतोषजनक उततर दें या ईशवर के असतितव को सवीकार करें। ईशवर को सवीकार न करने से उनका पकषपातपूरण होना परतीत होता है।       

हमने उपरोकत विचार विकासवाद की जिन मानयताओं व सिदधानतों को दृषटिगत करके परसतत किये है उसके अनसार वरतमान सृषटि अपने से पूरवरूपों का सवतः विकसित और उननत रूप है। पूरव से निरधारित न इसकी कोई योजना है और न इसका कोई परयोजन है। तदनसार समसत पराणियों के शरीर अमीबा नाम के क अतयनत निकृषट पराणी से परारमभ होकर क-दूसरे का विकृत रूप है। हम आशा करते हैं कि विजञान व अधयातम विजञान के समबदध लोग इस पर विचार करेंगे और वैदिक सिदधानतों को आगामी काल में विजञान दवारा सवीकार कर लिया जायेगा इसकी आशा करते हैं।

आईये, महरषि दयाननद के अनरूप संसार में विदयमान ईशवर, जीव व परकृति के सवरूप को भी जान लेते हैं। उनके अनसार - ‘‘ईशवर सचचिदाननद सवरूप, निराकार, सरवशकतिमान, नयायकारी, दयाल, अजनमा, अनादि, अननत, निरविकार, अनादि, अनपम, सरवाधार, सरवेशवर, सरववयापक, सरवानतरयामी, अजर, अमर, अभय, नितय, पवितर व सृषटिकरता है। (सभी मनषयों को) उसी की उपासना करनी योगय है।  सवमनतवय परकाश में उनहोंने लिखा है कि – “ईशवर कि जिसको बरहम, परमातमादि नामों से कहते हैं, जो सचचिदाननदादि लकषणयकत है जिसके गण, करम, सवभाव, पवितर हैं जो सरवजञ, निराकार, सरववयापक, अजनमा, अननत, सरवशकतिमान, दयाल, नयायकारी, सब सृषटि का करता, धरता वं हरता, सब जीवों को करमानसार सतय नयाय से फलपरदाता आदि लकषणयकत परमेशवर है, उसी को मानता हूं।“ महरषि दयाननद के लघ गरनथ आरयोददेशयरतनमाला में ईशवर के सारगरभित सवरूप पर परकाश डालते ह कहा गया है कि - ‘‘जिसके गण-करम-सवभाव और सवरूप सतय ही हैं, जो केवल चेतनमातर वसत है तथा जो क, अदवितीय, सरवशकतिमान, निराकार, सरवतर वयापक, अनादि और अननत, सतय गणवाला है, और जिसका सवभाव अविनाशी, जञानी, आननदी, शदध, नयायकारी, दयाल और अजनमादि है, जिसका करम जगत की उतपतति, पालन और विनाश करना तथा सब जीवों को पाप-पणय के फल ठीक-ठीक पहंचाना है, उसी को ईशवर कहते हैं।’आरय समाज का पहला नियम जो महरषि दयाननद जी का बनाया हआ है, उसके अनसार ‘सब सतय विदया और जो पदारथ विदया से जाने जाते हैं उन सबका आदि मूल परमेशवर है।’ इसका सरल अरथ है कि सब सब सतय विदयाओं तथा सृषटि के समसत पदारथों का आदि मूल origin and root ईशवर है।

अब दूसरे चेतन ततव ‘जीवातमा’के सवरूप को परसतत करते हैं। उनके सिदधानतों के अनसार जीवातमा चेतन, अलपजञ, कदेशी, सूकषम, आकाररहित, जनम-मरण धरमा, दःखों से निवृतति की इचछा रखने वाला, अजनमा, नितय, अनादि, सतकरमों से दःखों से निवृतत होकर वेदाधययन कर शरेषठ गण, करम व सवभाव को धारण कर जनम मरण से छूट कर मकति को परापत करने में समरथ ततव व क पदारथ है जिसको अगनि जला नहीं सकती, मृतय के बाद भी जिसका असतितव समापत नहीं होता, जल इसे गला नहीं सकता, शसतर इसे काट नहीं सकते और यह सा पदारथ है कि वाय इसे सख नहीं सकती है। इसी परकार से परकृति को भी जान लेते हैं। परकृति की दो अवसथायें हैं क कारण व दूसरी कारय। कारण अवसथा में यह अति सूकषम, सतव, रज व तम गणों की सामयावसथा, ईशवर के अधीन रहती है। सारा आकाश इससे भरा हआ होता है। इसी कारण परकृति से ईशवर रचना कर परमाण आदि अथवा महतततव, अहंकार, पांच तनमातरायें आदि बनाकर सृषटि जिसमें सूरय, चनदर, पृथिवी, नकषतर आदि हैं, निरमाण करता है। महरषि दयाननद व उनसे पूरव अनेकानेक पूजय ऋषियों दवारा परसतत जञान ही सतय, यथारथ व वासतविक है।

हम यह अनमान करते हैं कि भावी समय में कभी न कभी विजञान को महरषि दयाननद के इन वेदों व वैदिक साहितय पर आधारित विचारों को सवीकार करना ही होगा और तब विकासवाद का सथान वैदिक तरैतवाद को मिलेगा जिसमे वैजञानिकों व धारमिक लोगो सहित सारी मानवजाति सममिलित होगी।

ALL COMMENTS (0)