एक लंबी सियासी और अदालती लड़ाई के बाद 5 अगस्त को प्रधानमंत्री मोदी जी के हाथों द्वारा राम मंदिर का भूमि पूजन  शिलान्यास किया गया। करीब 493 साल लम्बे कालखंड के संघर्ष के पश्चात मर्यादा पुरुषोत्तम राजा रामचन्द्र जी के मन्दिर का भव्य भूमि पूजन हुआ। लेकिन इसी बीच ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड  की टिप्पणी आई है। सोशल मीडिया के प्लेटफार्म ट्विटर के माध्यम पर्सनल लॉ बोर्ड ने बयान जारी कर कहा कि बाबरी मस्जिद थी और हमेशा मस्जिद ही रहेगी। हम सब के लिए हागिया सोफिया एक उदाहरण है। दिल दुखाने की कोई बात नहीं है. स्थिति हमेशा एक जैसी नहीं रहती है।

सिर्फ इतना ही नहीं इसके बाद मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने अपनी वेबसाइट पर एक विवादित कहे जहर घोलने वाली प्रेस विज्ञप्ति भी जारी की है। जिसमें सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल और मक्का मदीना के उदहारण दिए गये है। यानि ये तक कहा गया की एक समय वहां भी मूर्ति पूजा होती थी लेकिन आज मस्जिदें है। इससे साफ समझा जा सकता है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड भविष्य में क्या योजना बना रहा है।

असल में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जो कुछ भी कह रहा है वह डर या धमकी स्वरूप नहीं कह रहा है। बल्कि जो कुछ कहा जा रहा है इसके एतिहासिक रूप से प्रमाण है। राम मंदिर से लेकर काशी मथुरा इसके प्रमाण है। इसके अलावा हाल ही में तुर्की के हागिया सोफिया चर्च को मस्जिद बनाया जाना भी इसी लक्ष्य का हिस्सा है। इसके अलावा मध्य युगीन भारत में करीब चालीस हजार हिंदू मंदिरों का विध्वंस भी इसी मानसिकता जा हिस्सा है, 1974 में उत्तरी साइप्रस में तुर्की द्वारा चर्च का विध्वंस करना, 1990 के दशक में मक्का की प्राचीन कलाकृतियों को सऊदी द्वारा ध्वस्त किया जाना, फिलीस्तीनियों द्वारा सन 2000 में यहूदियों की मजार को हटाया जाना, 2001 में तालिबान द्वारा बामियान बुद्ध की मूर्तियों को तोडा जाना, वर्ष 2002 में अल कायदा द्वारा ट्यूनीशिया में गरीबा गिरिजाघर पर बम गिराया जाना, 2003 में इराकी संग्रहालय, पुस्तकालय और अभिलेखागार को लूटा जाना। मिस्र के प्राचीन पिरामिड से लेकर विश्व भर की अति प्राचीन महत्व की सभ्यताओं को नष्ट कर ये मानसिकता अपना समय समय पर परिचय दे देती है।

दूसरा आगे बढे तो एक बार फिर उस धर्मनिरपेक्षता का नकाब भी इनके चेहरे से उतर गया जिसे लगाकर ये लोग अक्सर अपने तमाशे करते रहते है। तीसरा दरअसल यह टकराव आज लुकाछिपी का नहीं रहा, एशिया से लेकर यूरोप और अमेरिका भर में, ये अतिवाद बढ़ रहा है. कुछ समय पहले धार्मिक संबंधों से जुडी एक पत्रकार केरोलिन व्हाइट का इस संबंध में एक विस्तृत आलेख प्रकाशित हुआ था।

केरोलिन ने लिखा था कि दुनिया में 56 मुसलमान राष्ट्र हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि एक देश में जितनी विचारधारा के मुसलमान हैं वे अपनी सत्ता स्थापित करने की जुगाड़ लगाते रहते हैं। इसलिए इन देशों में मुसलमानों के अनेक गुट सत्ता हथियाने के लिए लड़ने और युद्ध करने के लिए, हमेशा तैयार रहते हैं। जिन देशों में उनकी संख्या कम होती है वे पहले तब्लीग और कन्वर्जन के नाम पर अपना संख्याबल बढ़ाते हैं। इस संख्या को बढ़ाने के लिए कन्वर्जन से लगाकर अधिक बच्चे पैदा करने, लव जिहाद की मुहिम चलाकर वे अपना संख्याबल बढ़ाते हैं और फिर कुछ ही वर्षों में एक नए देश की मांग करने लगते हैं। एशिया को विजय कर लेने के बाद वे अफ्रीका की ओर बढ़े। अवसर मिला और यूरोप में भी घुसे। आज इस्लाम परस्तों की यह लालसा है कि वे नम्बर एक पर पहुँच जाएं। वे किसी न किसी बहाने युद्ध को निमंत्रण देते रहते हैं। यह मुस्लिम कट्टरवादियों की बुनियादी रणनीति है जिस पर चलकर मुस्लिम जनता को युद्ध के लिए तैयार किया जा सकता है।

अब आप खुद सोचिये मदनी ने पचास साल क्यों कहे तो इसे समझने के लिए थोडा पीछे चले तो 3 अप्रेल साल 2015 को वॉशिंगटन स्थित प्यू रिसर्च सेंटर की एक रिपोर्ट आई थी जिसके अनुसार वर्ष 2050 तक भारत इंडोनेशिया को पीछे छोड़ कर पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा मुसलमान आबादी वाला देश बन जाएगा। तो मदनी को पता है कि उनके लोग इस विस्तार में रात दिन मेहनत कर रहे है यहाँ तक कि पिछले दिनों रांची के क्वारटाइन सेंटर में तबलीगी जमात की तीन महिलाये गर्भवती हो गयी थी। 23 जुलाई को दैनिक जागरण में यह खबर बड़े अक्षरों में प्रकाशित हुई थी जिसका अर्थ था कि आखिर सोशल डिस्टेंससिंग कहाँ गयी जब ये ही करना था तो घर में ही कर लेते। तो लक्ष्य अभी संख्याबल बढ़ाने का है जैसे ही संख्या बल बढ़ जायेगा लाठी हाथ में आ जाएगी और भारत फिर से मध्ययुगीन यानि सातवीं सदी में चल जायेगा।

लेकिन भारत के बहुत पढ़े लिखे और अत्यधिक शिक्षित कथित धर्मनिरपेक्षवादी अभिव्यक्ति के नाम पर हमारे देश में अक्सर अपनी लीला करके मीडिया में छाये रहने वाले लोग, ऐसी खबरों को घास नहीं डालते न इन्हें विवादित बयान मानते उनके लिए ऐसे बयान मायने नहीं रखते हाँ इसके विपरीत खबरें छप रही है कि चांदी की ईंट से शिलान्यास करके आस्था को लोगों के बीच अंतर पैदा करने के लिए और भारत की युवा पीढ़ी में दरारें डालने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। मर्यादा-पुरुषोत्तम राम को भारत में शएक सिकुड़ती हुई सोच का प्रतीक बनाया जा रहा है, हम भले ही इसे एक नए भारत का नाम दें, पर ये उस भारतीय गणतंत्र पर गहरा आघात है आदि आदि।

जबकि इसके विपरीत अमेरिकी लेखक डेनियल में 2002 में लिखा था कि छठी सातवीं शताब्दी में मुहम्मद ने जिस युद्ध की घोषणा की थी वह आज तक जारी है। चाहें सूफीयाना मजार के नाम पर हो, आतंक को नाम पर हो, हथियार लेकर घुसपैठ के आधार पर हो, या आँखों में आंसू लेकर शरणार्थी बनकर दुसरे मत आस्था वालों के क्षेत्र में घुसने के आधार पर हो, धर्मनिरपेक्षता के आधार पर हो सिलसिला तब तक चलता रहेगा, जब तक या तो अन्य लोग आँखें नहीं खोल लेते या ये लोग अपना इच्छित लक्ष्य स्वीकार नहीं कर लेते। इस्लाम में आज जो कुछ है या बीते कल में जो कुछ रहा हो इसका कोई अर्थ नहीं है और यह आने वाले कल में कुछ अलग होगा यह सोचना भी बेकार है। क्योंकि अभी भी ट्विटर पर एक खेमे द्वारा ट्रेंड चलाया जा रहा है कि बाबरी जिन्दा है। दूसरी और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड उसकी शाहदत का रोना रो रही है। हालाँकि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का बयान पढ़कर लग रहा है कि समय की तलाश है वरना बाबरी अभी भी इनके मन और सोच में जिन्दा है।

लेख-राजीव चौधरी

 


 

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