किसानों को अपनी फसल व उपज को रोगों से बचाने के लि कीटनाशकों का परयोग करना पड़ता है। हमें भी कई बार णटीबायटिक ओषधियों का सेवन करना पड़ता है जिससे कि हमारा रोग ठीक हो जाये? हमें क पाठक-मितर ने लिखा है कि दही में भी कछ सूकषमजीवी जीवाण होते हैं जो दूध को दही बनाते हैं। यदि हम दही का सेवन करते हैं तो उन सूकषम जीवाणओं की हतया हो जाती है जिससे लगता है कि हमसे अधरम हो रहा है? से परशन हम सबके सामने आते रहते हैं, अतः इन पर विचार करना आवशयक है। हो सकता है कि हम सब इस पर क मत न हों सकें परनत क दूसरे का पकष तो जान ही सकते हैं जिससे निरणय किया जा सकता है। अब यदि किसान अपने खेतों में कीटनाशक का परयोग न करें तो उनकी फसल चैपट हो सकती है जिससे देश में अनन की समसया उतपनन हो जायेगी। हम रोग होने पर णटीबायटिक दवा न लें तो हमारा रोग बढ़ेगा जिससे हमारा जीवन संकट में पड़ेगा जबकि सवसथ रहना और रोग होने पर औषध सेवन करना हमारा शासतर-सममत करतवय है। यदि हम दही नहीं खायेंगे तो इससे हम दही से सवासथय को होने वाले लाभों से वंचित हो जायेंगे। अतः हमें फूल-पौधों व सवयं को रोगों से बचाने तथा सवसथ रहने के लि कीटनाशकों का परयोग करना वा दही का परयोग करना आवशयक सिदध होता है।

 अब यह देखना है कि हमारे इन कारयों से अधरम या पाप होता है कि नहीं? पहली बात तो यहां यह है कि हम अपने निजी सवारथ के कारण तो सा कर नहीं रहे हैं। परकृति ने ही सी वयवसथा कर रखी है। यदि कीटाणओं को फसल को हानि पहचाने का अधिकार है तो कया फूल-पौधों की रकषा करना हमारा करतवय नहीं है। कया कीटनाशकों से कीटाणओं व रोग-जीवाणओं को समापत किये बिना ही हम फल-पौधों व अपने सवासथय की रकषा कर सकते हैं? हमारा विचार है कि सा समभव नहीं है। अतः फूल व पौधों की रकषा करने के लि जिन हानिकारक कीटों को नषट किया जाता है, हमें लगता है कि यह आवशयक होने के कारण अधरम या पाप नहीं हो सकता। यह पाप तब होता यदि कीटाणओं को हमारे फूल व पौधों को कोई हानि न पहंचती और हम उनको कीटनाशकों का परयोग करके उनको समापत करते। अतः कीटों को समापत करने का परयापत औचीतय होने से यह अधरम व पाप नहीं ठहरता।

अब इसी परकार से शारीरिक रोगों में णटीबायटिक ओषधियों के परयोग से बैकटीरिया नषट होते हैं या इनकी हमारे शरीर में वृदधि पर अंकश लगता है। हम यह दवा अकारण नहीं ले रहे हैं। अतः शरीर को सवसथ रखने के लि हमें अपने करतवयों वा धरम का पालन करना है। इस कारण णटीबायटिक जिससे बैकटीरिया नषट होते हैं, का सेवन भी अधरम या पाप शरेणी में नहीं आता। इसी परकार से दही का सेवन भी जिसमें बैकटीरिया या सूकषमजीवाण होते हैं, वह हम इस लि सेवन नहीं करते कि इसमें जीवाण हैं अपित इसका सेवन दही के सवासथयवरधक गणों के कारण किया जा सकता है। इन जीवाणओं को ईशवर ने उतपनन ही इस कारण से किया है कि दूध को दही बनाया जा सके और इन जीवाणओं की दही में वृदधि व उपसथिति पराकृतिक नियमों के अनसार होती है। यह जीवाण दूध की दही हमारे सेवन के लि ही तो बनाते हैं। उनका अपना तो कोई परयोजन दही बनाने का होता नहीं है। हम तो केवल सवासथय लाभ के लि ही सा करते हैं। अतः इसमें भी कहीं कोई पाप दृषटिगोचर नहीं होता। इन सब कारणों से इन सब बातों में पाप व अधरम की कलपना निरमूल सिदध होती है। सा ही हरी तरकारियों वा सबजियों के सेवन के बारे में भी कहा जा सकता है।

 हम यह भी जानते व देखते हैं कि चूलहा-चककी को चलाने व धान व गेहूं को कूटने-पीसने से भी कछ जीव-जनतओं का नाश होता है। इसी परकार से हम जब पैदल चलते हैं तो हमारे पैरों से दब कर कछ चीटियां आदि जनत मृतय को परापत होते हैं। कपड़े धोने आदि से भी कछ जनतओं को हानि पहंचती है। सी और भी सथितियां हो सकती हैं जहां अनचाहे हमें आंखों से दृषटिगोचर होने वाले जीव-जनतओं को हमारे दवारा कषट पहंचता है परनत हम विवश हैं। अनचाहे में हमारे दवारा सा होता है। इस विषय पर हमें अपने शासतरकारों के विचार व समाधान परापत हैं। इस विवशता में होने वाले पाप का कारण हमारी इचछा न होकर विवशता है। इसका सबसे अचछा निवारण कया हो सकता है कि हम इसके लि उचित परायशचित करें। हमारे विदवान ़ऋषियों ने इसका उपाय दैनिक अगनिहोतर को बताया है। इसके साथ बलिवैशवदेव यजञ करने से भी हम पराणी मातर के परति अपनी दया, परेम, सनेह, करूणा व उनके परति मैतरी की भावना को परदरशित करते हैं। अगनिहोतर व बलिवैशवदेव यजञ के करने से चीटीं आदि कीटाणओं को होने वाले दःख व पीड़ा से उतपनन पाप का आंशिक व पूरण निवारण होता है। अगनिहोतर से वायमणडल में असंखय पराणियों को शवसन करिया दवारा शदध व आरोगयकारक पराणवाय मिलने से इसके पणय का लाभ यजञकरता को होता है। इसी परकार बलिवैशवदेव-यजञ के करने से साकषात वा परतयकष लाभ पश, पकषियों व जीव-जनतओं सहित कीटाण आदि को होता है।  इससे हम अजञानता व विवशता वश होने वाले पापों से मकत हो जाते हैं। इन विचारों व कारणों से यह भी सिदध होता है कि परतयेक साधन समपनन गृहसथी, जिसे अगनिहोतर करने की सविधा व साधन उपलबध हैं, नियमित रूप से ऋषियों की आजञा का पालन कर जीवन को दोष-पाप मकत करना चाहिये। यहां यह भी उललेख करना समीचीन है कि अंहिसक पराणियों के परति ही अंहिसा की भावना उचित है तथा हिंसक व दषटों के परति यथायोगय वयवहार ही धरम है।

 इस विषय में पाठकों के अनय विचार भी हो सकते हैं। हम निवेदन करेंगे कि हमारे विचारों से असहमत पाठक हमें अपने विचारों से अवगत करायें और इस समसया के समाधान पर अपने विचारों से अवगत करायें।  

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