हम संसार में जनमें हैं। हमें मनषय कहा जाता है। मनषय शबद का अरथ मनन व चिनतन करने वाला पराणी है। संसार में अनेक पराणी हैं परनत मनन करने वाला पराणी केवल मनषय ही है। मनषय का जनम-माता व पिता से होता है। यह दोनों मनषय के जनम में मखय कारण वा हेत दिखाई देते हैं और यह है भी सतय। बिना माता व पिता के किसी भी मनषय का जनम नहीं हो सकता। जिस परकार से सनतान अपने माता व पिता से जनम लेता है उसी परकार से ही उसके माता पिता का जनम भी अपने-अपने माता-पिताओं से हआ है। हमारे पास इतिहास के पराने से पराने गरनथ हैं। वेद ईशवरीय जञान है जिसमें मनषय जीवन वयतीत करने की समपूरण जीवन परणाली व जीवन शैली दी गई है। इसके अतिरिकत वेद के बाद बराहमण गरनथों का निरमाण ततकालीन विदवान ऋषियों ने किया। इन बराहमण गरनथों को क परकार से वेदों की वयाखया वं इतिहास के गरनथ कह सकते हैं। वेद वं इन बराहमण गरनथों से विदित होता है कि सृषटि के आरमभ से मनषयों का जनम अपने-अपने माता-पिताओं से होता आ रहा है। जब सृषटि के आरमभ में पहंचते हैं तो हमें आदि मनषयों के माता-पिता का होना बदधि, जञान व अनमान से असमभव सिदध होता है। उस काल के यदि कोई गरनथ हैं तो वह केवल वेद वं बराहमण गरनथ ही हैं। इनसे यही विदित होता है कि सृषटि की रचना परमातमा से हई है। परमातमा ने ही सृषटि के आरमभ में मनषयों सहित समसत पराणी जगत की अमैथनी सृषटि की। अमैथनी सृषटि बिना माता-पिता की सृषटि को कहते हैं। कया अमैथनी सृषटि समभव है तो इसका उततर है कि अमैथनी सृषटि समभव है जिसका परमाण सृषटि के आरमभ में माता-पिता के न होने के कारण मनषयों अरथात सतरियों व परूषों का उतपनन होना है। यदि यह अमैथनी सृषटि न होती तो संसार चलता ही न। और यदि परमातमा इस अमैथनी सृषटि व सृषटि की रचना न करता तो यह संसार बन भी नहीं सकता था।

 सृषटि की उतपतति व इसके संचालन के विषय में वेदों में कया जञान है?, उसे जानकर इस सृषटि में घटाते हैं। यदि वह सृषटि के सरवथा अनरूप है तो सतय है अनयथा नहीं है। वेदानसार ईशवर सृषटि का आदि निमितत कारण है। ईशवर सतय, चितत, आननदसवरूप, सरवजञ, निराकार, सरवशकतिमान, नयायकारी, दयाल, अजनमा, अनादि, अनपम, सरवाधार, सरववयापक, सरवानतरयामी, अजर, अमर, अभय, नितय, पवितर, सरवातिसूकषम और सृषटिकरतता आदि सवरूप गणों वाला वेदानसार है। ईशवर से इतर इस दृशयमान जगत का आदि कारण परकृति है जो सवभाव से जड़ वं सूकषम तथा ईशवर के आधीन है, अनादि, नितय अरथात सदा-सरवदा से विदयमान है। ईशवर ने इस जड़ कारण परकृति को अपनी सरवजञता व सवभाविक जञान, जैसा वह पूरव कलपों में सृषटि की रचना, पालन व परलय करता आया है, अनतरयामी, सरवजञता व सरवशकतिमान सवरूप से इस बरहमाणड को रचा है। सृषटि न तो अपने आप बन सकती है और न ईशवर के अतिरिकत अनय कोई कारण बरहमाणड में उपसथित है। ईशवर के असतितव का परमाण ही सृषटि की रचना पराणी जगत का असतितव तथा उसका वयवसथित रूप से उतपतति संचालन है। यह विवेकी मनषय हर पल और हर कषण अनभव करते हैं। ईशवर व परकृति के अतिरिकत इस संसार में जीव नाम की तीसरी व अनतिम अनादि व नितय सतता है। जीव चेतन सवरूप है तथा आननद से रहित तथा आननद व सख का अभिलाषी है। यह सख इसे मनषय आदि भिनन-भिनन पराणी योनियों में जनम लेकर ही परापत होता है अथवा मनषय जीवन में शभ करमों को करके मकति वा मोकष परापत होने पर ईशवर के दवारा परदान किया जाता है। जीव का सवरूप सूकषम पदारथ या सतता, कदेशी, आकार रहित, नेतरों से अदृशय, अलपजञ, जञान व करम के सवभाववाला, करम-फल-चकर में बनधा हआ, शभाशभ करमों का कतरता व इनके फलों का भोकता, ईशवरोपासना, यजञ, दान, सेवा, परोपकार, वेदविदया की परापति, सतकरमों व वेदानसार जीवन वयतीत कर मकति को परापत होता है। ईशवर संखया में क है। परकृति भी क है परनत कारण अवसथा में यह सूकषम होकर पूरे बरहमाणड में फैली हई वा विसतृत रहती है। ईशवर परकृति की इस परमाण वा इससे पूरव की सथिति को कतरित व नियमों के अनसार परमाणरूप कर सथूल व घनीभूत बनाते ह कारय सृषटि का रूप परदान करते हैं जैसे कि भवन निरमाण करने से पूरव सभी सामगरी को कतर कर उसे वयवसथित रूप दिया जाता है। सा ही परमातमा ने सतव, रज व तम गणों वाली सरवतर फैली व विसतृत परकृति को अपने अनतरयामी व सरवशकतिमान सवरूप से कतरित कर वरतमान सवरूप सूरय, पृथिवी, चनदर, अनय गरह व उपगरह, अनय सौर मणडल, नकषतर व निहारिकाओं आदि की उतपतति करके किया है। सृषटि की उतपतति का जञान ईशवर में नितय अरथात अनादि काल से है। वह न तो कम होता है और न वृदधि को परापत होता है। वह सदा क समान व क रस ही रहता है। इसका जीता-जागता परमाण ही वरतमान की सृषटि वा हमारा बरहमाणड है।

 अब हम वरतमान सृषटि पर दृषटि डालते हैं तो हम पाते हैं कि यह सृषटि बहत परानी है। इसके काल की कलपना करते हैं तो कह सकते हैं कि यह हजारों, लाखों व करोड़ों वरष परानी है या इसका इतना पराना होना समभव है। वैदिक संसकृति व सभयता के अनसार वेद समवत क अरब छियानवें करोड़ आठ लाख तरेपन हजार क सौ पनदरह वरष पूरण होकर चैतर शकल परतिपदा से क सौ सोलहवां वरष आरमभ हआ है। यह गणना हमारे पूरवज सृषटि के आरमभ से करते आये हैं। परतयेक धारमिक अनषठान के आरमभ में अनषठान का संकलप करते ह इसे बोला जाता है। देशी व विदेशी वैजञानिकों के अनमान भी लगभग इतनी ही अवधि सृषटि की उतपतति की मानते हैं जिनसे दोनों का परायः समनवय हो जाता है। मनषयों के पराचीन इतिहास के दो परमख गरनथ महाभारत और बालमिकी रामायण भी हमारे पास सलभ हैं। इनके अनसार महाभारत काल लगभग पांच हजार वरष व बालमिकी रामायाण का काल कई लाख व करोड़ वरष पूरव सिदध होता है। इस लमबे काल से मनषय व अनय पराणी जनम लेते आ रहे हैं। इन सभी पराणियों में भिननता होते ह भी क वयवसथा दिखाई देती है जो करम फलों के अनसार है। शभ करम करने वाले मनषयों की यश व कीरति फैलती है व विपरीत की निनदा होती है। शभ करम करने वाले दीरघ जीवी होते हैं व निनदित करम करने वाले अलपाय होते हैं। अचछे करमों को करके मनषय सममानित व सखी होते हैं व उनहें परभूत धन व समपतति परापत होती है। वह जञानारजन करते हैं जिनमें वेद जञान भी सममिलित है तथा निनदित करम करने वाले परायः सखों से वंचित ही रहते हैं। यह सब वयवसथा परकृति में करम फल सिदधानत को पषट करती है। इससे यह निषकरष निकाला जा सकता है कि मनषयों में विदयमान जीवातमा ही मनषय शरीरों में करमों की करतता है और यह जनम-जनमानतर को परापत होकर मनषय व इतर पराणी योनियों में जनम लेकर करम फलों को भोगता है। इससे ईशवर, परकृति, जीवातमा के असतितव व करमफल सिदधानत का साफलय सिदध होता है। यही वैदिक सिदधानत है। अनय मतों के सिदधानत भी वैदिक मतों के परचलित सिदधानतों को अनय-अनय मतों में समाविषट कर बनाये गये हैं। जो लोग वैदिक सिदधानतों को नहीं मानते उनहें अलपजञ, अशदध व अपरिपकव, रज व तमों गण वाली बदधि, मन व मसतिषक से यकत मनषय ही कह सकते हैं। इस संकषिपत विवेचन से जञात होता है कि मनषय जनम, आय और सख-दःखी रूपी भोग हमें ईशवर के दवारा हमारे पूरव जनमों के करमों के अनसार मिले हैं। महरषि पतंजलि वेदों व करमफल सिदधानत के मरमजञ ऋषि थे। उनहोंने कहा है कि मनषय के करमों से परारबध बनता है जिससे मनषय के नये जनम की जाति, आय व भोग निशचित होते हैं। यहां जाति का अरथ मनषय, पश, पकषी आदि परकार भेद से असंखय योनियां हैं। आय जीवनकाल है तथा भोग सख व दख व इनके साधन हैं। महरषि पतंजलि का यह सिदधानत भी सृषटि में कारयरूप में विदयमान देखा जा सकता है। इन सभी विषयों को अधिक गहराई से जानने के लि महरषि दयाननद सरसवती कृत सतयारथ परकाश, ऋगवेदादिभाषय भूमिका सहित आरय विदवानों के वेदों पर आधारित भिनन-भिनन विषयों के गरनथों को देखना चाहिये व उनकी संगति कर उनसे शंका समाधान कर निभररानत होना चाहिये। इसी के साथ इस चरचा को विराम देते हैं।

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