संसार का रचयिता ईशवर सतय, चेतन, आननदसवरूप, संसार का सवामी, रकषक, पिता, सृषटि में वयापक, सरवजञ, निराकार, सरवशकतिमान आदि गणों वाला है। ईशवर को जानने व समने के लि गण व गणी के सिदधानत को समना आवशयक है। हम जल पर विचार करते हैं। जल में आकार व रूप है। जल शीतल व पयास बाने वाला है। अगनि पर डालने से अगनि बती है। अगनि के समपरक में आकर यह गरम हो जाता है और वाषप बनकर वाय के साथ आकाश में सथित रहकर गति करता है तथा बादल बनकर बरसता है। यह सब गण जल में हैं। हम यदि कहीं जल को देखते हैं तो इन गणों के कारण ही हम उसे जल कहते हैं। यहां जल गणी व दरव, शीतलता आदि गण हैं। जल जैसा आकार व रूप तो अनय दरवों में भी पाया जाता है परनत वह जल नहीं होते। उनके गण जल से भिनन होने के कारण उनको अनय अनय नाम दिये गये हैं। जल में मनषय व पशओं की पयास बाने वाला गण है, यह गण जल में आंखों से दिखाई नहीं देता। यदि हमें पयास लगी हो और हम पयास दूर करने के लि किसी को कहे और वहां हमें कोई जल देता है, यदि हम बिना उसे देखे वा आंखे बनद कर उसे पी लेते हैं और हमारी पयास ब जाती है तो उसके रस व सवाद तथा पयास बने के गण के कारण हम यह कहेंगे कि हमने जल पिया है। इसी परकार जब हम सृषटि की रचना को देखते हैं तो हम सृषटि रचना में जो गण पाते हैं उनहें जानकर यदि वह अपोरूषेय है तो उसे ईशवर के दवारा रची व निरमित मान लेते हैं। हमारे सामने क पसतक है। इसका लेखक, मदरक व परकाशक हमारे सामने नहीं है परनत हम उस पसतक को देखकर यह बिना किसी के बताये ही मान लेते हैं कि मनषय रूप में इसका लेखक, मदरक व परकाशक कोई अवशय है। इसी परकार से सृषटि में उपलबध अनय अपौरूषेय पदारथों को देखकर हमें इनके गणी रचयिता ईशवर का जञान हो जाता है। सृषटि रचना उसका क गण है। रचना जब भी होगी किसी रचयिता के दवारा ही होगी। रचनाकार हमेशा निमितत कारण होता है। वह बनाने वाला है, परनत केवल बनाने वाले से ही रचना नहीं होती, उसके लि वह पदारथ भी चाहिये होता है जिससे रचनाकार रचना करता है। रचना के परयोग में लाया गया वह पदारथ उपादान कारण कहलाता है। किसी भी रचना का कोई न कोई उददेशय अवशय होता है। पसतक पाठकों के लिये है। कमपयूटर, मेज व करसी उनके उपभोकताओं के लिये होती है। बिना उपभोकता या उपयोगकतरता के रचनाकार रचना में परवृतत नहीं होता। इसी परकार से इस सृषटि का निमितत कारण ईशवर है। सृषटि की रचना उसने मूल परकृति तो सतव, रज व तम गणों वाली है, उससे की है। यह सृषटि व उसके पदारथों की रचना जीवों वा मनषय-पश-पकषी आदि पराणियों के सखोपभोग लिये की गई है। इस विवरण से भी ईशवर की सतता सिदध होती है। यदि ईशवर व मूल परकृति न होती और यदि जीवातमायें जो मनषयादि शरीरों का धारण ईशवर के दवारा करती हैं, न होतीं, तो यह संसार कदापि न रचा जाता अरथात इसका असतितव न होता। अतः जितना हमें अपने और इस सृषटि के असतितव पर विशवास है उतना ही विशवास हमें सृषटि के बनाने व जीवातमाओं को मनषय व पश आदि पराणियों के रूप में जनम देने वाले ईशवर पर भी करना चाहिये।

कोई भी रचना चेतन पदारथ व सतता दवारा ही होती है। जड़ पदारथ सवयं मिलकर कोई बदधियकत रचना नहीं करते व कर सकते हैं। इसलि ईशवर चेतन पदारथ है। चेतन का क गण आननद वा सख-दःख आदि गणों से यकत होना है। मनषयों व अनय पराणियों में हम समय-समय पर सख व दःख दोनों को होता हआ देखते हैं। सख की अवसथा में मनषय अपनी जञान व सामथरय के अनसार कामों को करता है। रोगादि दःख की अवसथा में वह कारय नहीं कर पाता। ईशवर ने इस अनपमेय बरहमाणड को बनाया और उसका संचालन कर रहा है। यदि उसमें दःख आता-जाता, तो वह इस रचना व इसका पालन व संचालन नहीं कर सकता था। अतः ईशवर आननद सवरूप सिदध होता है। इसका क कारण यह भी है कि दःख आतमा को शरीर के दवारा ही होते हैं व इसमें कछ कारण जीवातमा की अजञानता भी होती है। ईशवर का शरीर नहीं है, वह निराकार और सरववयापक है, वं अजञानशूनय वा सरवजञ है, अतः शरीर न होने और अजञानता न होने से वह दःखों से सरवथा रहित है। उसकी सृषटि आदि रचना और कारयों को देखकर वह सरवजञ सिदध होता है। सरवजञ का अरथ है कि जो कछ भी जानने योगय है, वह उसे जानता है। सरवजञता का उसका यह गण अनादि व नितय है, इस कारण वह सदा बना रहेगा, अलप व नयूनाधिक नहीं होगा। इसमें सरवजञता सवतः व सवभाव से है। इसका कोई अनय निमितत कारण नहीं है। जैसे मनषय माता-पिता व आचायों अथवा पसतकों से जञान अरजित करता है, ईशवर के लि जञान परापति का कोई साधन नहीं है जिससे उसने यह जञान लिया हो। अतः उसकी सरवजञता अनादि व उसके सवयंभू सवरूप के कारण से उसमें है।

परतयेक वसत व पदारथ का कोई न कोई सवामी अवशय होता है। इस संसार को देखने पर इसका सवामी ईशवर ही सिदध होता है। दूसरा कोई संसार का सवामी होने का दावा करने वाला है ही नहीं। अतः वह सवयंभू व संसार का सवामी है। मनषय व अनय पराणियों को अपनी रकषा की चिनता होती है जिस पर वह धयान देते हैं। संसार के सभी पराणियों की रकषा वही ईशवर करता है। उसके निज नाम ओ३म का अरथ ही रकषा करने वाला है। यदि वह हमारी रकषा न करता तो हम क कषण भी जीवित नहीं रह सकते थे। मनषय को कछ कषण वाय न मिले तो मृतय हो जाती है। हमें वाय को परापत करने के कोई परयतन नहीं करना होता। सारी पृथिवी के ऊपर उसने क आवरण बनाया हआ है। वह पूरी पृथिवी पर सरवतर उपलबध है। इसी परकार से जल, अगनि व अननादि नाना पदारथ भी पूरी पृथिवी पर उपलबध होते हैं जिनसे हमारी रकषा होती है। अपनी रकषा के लिये ईशवर ने हमें बहपयोगी दो हाथ व बदधि तथा शरीर में बल भी दिया है। आतम-रकषा के अनय परकार भी हैं जिनका उपयोग कर हम सवयं को सरकषित करते हैं। ईशवर का जीवातमा से पिता-पतर व आचारय-शिषय अथवा सवामी-सेवक का समबनध है। ईशवर ने हमें न केवल माता-पिता व आचारय परदान किये हैं अपित माता-पिता के हृदयों में सनतान को जनम देने व पालन करने की दिवय भावनायें भी भरी हई हैं। इसी परकार से आचारयों में भी योगय शिषयों को अपना समसत जञान देने की भावना भी उसने भर रखी है। गरू विरजाननद सरसवती व महरषि दयाननद सरसवती इसका उदाहरण थे। जो सा करते हैं वह सममानित व पूजय होते हैं। आजकल शिकषा व जञान को बेचा जाता है। यह अमानवीय व अदैवीय कारय है। यह वंदनीय नहीं अपित अवनदनीय है। ईशवर से हमारा समबंध सवामी-सेवक का है। हमें ईशवर के गण-करम-सवभाव व उसकी भावनाओं-अपेकषाओं-आजञाओं को जानकर उसके अनरूप गणों का धारण व करतवयों का निरवाह करना है।

 ईशवर ने यह विशाल बरहमाणड बनाया है, अतः वह कदेशी तो हो हि नहीं सकता। कदेशी सतता से जो रचना होगी वह ससीम व कदेशी व दोषपूरण ही हो सकती है, असीम, अननत व निरदोष नहीं। अतः वह सरववयापक व सरवतर विदयमान सिदध होता है। आंखों से आकाशवत दिखाई न देने के कारण वह निराकार है। सरववयापक सतता का निराकार होना भी तरक व यकति संगत है। जीवातमा कदेशी व ससीम है। अतः ईशवर व जीवातमा का वयापय-वयापक समबनध है। जड़वत आकाश के साथ भी जीवातमा का यही समबनध है। ईशवर का क महतवपूरण गण उसका सरवशकतिमान होना है। इसका परमाण सृषटि की रचना और जीवातमाओं का जनम-मृतय का चकर है। ईशवर सरवातिसूकषम व सरववयापक होने के साथ सरवानतरयामी भी है। वह असंखय वा अननत जीवातमाओं के अनदर व बाहर विदयमान है। जीवातमाओं के भीतर व बाहर विदयमान होने के कारण ही उसे सरवानतरयामी कहते हैं। चेतन व सरवानतरयामी होने तथा हर पल जागृत अवसथा में होने से वह जीवातमा के परतयेक विचार व कारय को जानता व देखता है और अपनी करम-फल वयवसथा से उसे जनम-जनमानतर में उसके परतयेक शभाशभ करम का फल देता है। यजरवेद के 40/8 मनतर परयगाचछकरमकायमवरणमसनाविरं शदधमपापविदधम। कविरमनीषी परिभूः सवयमभूरयाथातथयतोऽरथान वयदधाचछाशवतीभयः समाभयः।। में ईशवर ने मनषयों को महतवपूरण शिकषा दी है। ईशवर ने बताया है कि वह परमातमा सब में वयापक, शीघरकारी और अननत बलवान है। वह शदध, सरवजञ, सब का अनतरयामी, सरवोपरि विराजमान, सनातन, सवयंसिदध, परमेशवर अपनी जीवरूप सनातन अनादि परजा को अपनी सनातन विदया से यथावत अरथों का बोध वेद दवारा कराता है। वह कभी शरीर धारण व जनम नहीं लेता, जिस में छिदर नहीं होता, नाड़ी आदि के बनधन में नहीं आता और कभी पापाचरण नहीं करता, जिस में कलेश, दःख, अजञान कभी नहीं होता, इतयादि। इस पर महरषि दयाननद ने टिपपणी की है कि जो-जो गण ईशवर में हैं, उनसे ईशवर की सतति करना सगण सतति है। ईशवर में जो-जो गण नहीं है, यथा शरीर धारण न करना, जनम न लेना, नाड़ी आदि के बनधन में न आना, पापाचरण न करना, कलेश, दःख व अजञान से रहित मानकर सतति करना है वह निगरण सतति कहलाती है। इस सगण व निरगण सतति को करते ह मनषयों को अपने गण, करम, सवभाव भी उसी के अनरूप बनाने चाहियें। जैसे वह नयायकारी है तो आप भी नयायकारी होवें। और जो केवल भांड के समान परमेशवर के गण-कीरतन करता जाता है और अपने चरितर को नहीं सधारता, उसका सतति करना वयरथ है। आजकल से लोगों की समाज में बहतायत है। महरषि दयाननद दवारा परसतत उपनिषद वचन ‘‘अपाणिपादो जवनो गरहीता पशयतयचकषः शरृणोतयकरणः। वेतति विशवं तसयासति वेतता तमाहरगरयं परूषं पराणम।। परमेशवर के हाथ नहीं, परनत अपनी शकतिरूप हाथ से सब का रचन व गरहण करता है। पग नहीं, परनत वयापक होने से सब से अधिक वेगवान, चकष का गोलक नहीं परनत सब को यथावत देखता, शरोतर नहीं तथापि सबकी बातें सनता, अनतःकरण नहीं, परनत सब जगत को जानता है और उस को अवधि सहित जाननेवाला कोई भी नहीं। उसी को सनातन, सब से शरेषठ सब में पूरण होने से परूष कहते हैं। सब इनदरियों और अनतःकरण के बिना अपने सब काम अपने सामरथय से करता है।

ईशवर विषयक इस लेख में जो चरचा की गई है, वह पाठको को रूचिकर वं जञानवरधक हो सकती है। पाठक सतयारथपरकाश, दरशन, उपनिषद व वेद आदि का सवाधयाय कर ईशवर, जीवातमा व सृषटि विषयक वह सब अभीषट को जान सकते हैं। इन गनथों में जो निरदोष विदया है वह किसी मत व पनथ के गरनथ वा धरम-पसतकों में नहीं है। इस जञान व योग दरशन निहित यम, नियम, आसन, पराणायाम, परतयाहार, धारणा, धयान समाधि आदि साधनों के अभयास से इस जनम सहित परजनम में भी लाभ होता है। यह सब बातें तरक, यकतियों व सतय शासतरों के परमाणों से सिदध है।

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