आज का युग विज्ञान का युग है। विज्ञान विशिष्ट ज्ञान को कहते हैं। विज्ञान ज्ञान की वह विधा है जिसमें हम सृष्टि में कार्यरत व विद्यमान नियमों को जानकर व उनका उपयेाग करके अपनी आवश्यकता के नाना प्रकार के पदार्थों का निर्माण करते हैं। विज्ञान के नियमों की बात करें तो पदार्थों के सामान्य गुणों सहित उष्मा, प्रकाश, गति, चुम्बकत्व के ज्ञान सहित पदार्थ का सर्वातिसूक्ष्म अंश परमाणु व इससे जुडे़ अनेकानेक नियम व इनके उपयोग इसमें आ जाते हैं। आज विज्ञान की सहायता से ही हमारे वस्त्र बनते हैं, भोजन के अनेक पदार्थ बनते हैं और उपयोग की वस्तुएं जिसमें टीवी, कम्पयूटर, रेल, वायुयान, कार, स्कूटर, कागज, पेन, पेंसिल व पुस्तकें आदि आती हैं, सब विज्ञान से किसी न किसी रूप में जुड़ी हुई हैं। विज्ञान, पदार्थों के समान्य ज्ञान के बिना उत्पन्न नहीं हो सकता। ज्ञान बिना भाषा के उत्पन्न नहीं होता और आदि भाषा, जो कि संसार में एकमात्र संस्कृत है, बिना ईश्वर के प्राप्त वा उत्पन्न नहीं की जा सकती। जिस प्रकार से यह समग्र सृष्टि अपौरूषेय है अर्थात् पुरूषों से बनने योग्य नहीं है, अतः इसको उत्पन्न करने वाली अवश्य ही एक अपौरुषेय सत्ता सिद्ध होती है। इसी प्रकार परस्पर संवाद व ज्ञान के आदान प्रदान के लिए प्रयुक्त भाषा जो सृष्टि के आदि में मनुष्यों को प्राप्त होती है, वह भी अपौरुषेय रचना ही होती है जिसका आदि मूल सृष्टि की भांति ही परमेश्वर है।

विज्ञान का आरम्भ भाषा व ज्ञान की उत्पत्ति के बाद हुआ है। ऐसा नहीं है कि विज्ञान भाषा व ज्ञान से सर्वथा भिन्न है। ज्ञान व विज्ञान दोनों के लिए आधारभूत साधन भाषा ही होती है। भाषा व ज्ञान होगा तो विज्ञान विकसित व उन्नत हो सकता है और यदि भाषा व ज्ञान न हो तो विज्ञान की खोज व उसको उन्नत नहीं किया जा सकता। एक प्रकार से विज्ञान भाषा व ज्ञान में ही समाहित होता है जिसे चिन्तन, मनन व प्रयोगों द्वारा खोजना पड़ता है। ज्ञान का मन्थन कर ही विज्ञान को उत्पन्न किया जाता है। संसार में ज्ञान कहां से आया? इसे जानने के लिए पहले संसार को जानना होगा। इसका उत्तर वेद और वैदिक साहित्य में मिलता है। यह संसार सत्, रज व तम गुणों वाली सूक्ष्म प्रकृति से घनीभूत होकर बना है। इस तथ्य का हमारे दर्शन के ऋषियों व आचार्यों ने अपनी साधना व तपस्या से साक्षात्कार किया है और उसका अपने ग्रन्थों में वर्णन किया है। इस सृष्टि को बनाने वाली सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सर्वातिसूक्ष्म वा सर्वान्तरयामी एक सत्ता है जिसे ईश्वर कहते है। यदि प्रकृति से भी सूक्ष्म सर्वव्यापक ईश्वर ने प्रकृति के सूक्ष्म कणों को अपने ज्ञान व विज्ञान के अनुसार घनीभूत कर यह दृश्य व स्थूल जगत न बनाया होता तो फिर विज्ञान क्या है व यह कैसे उत्पन्न हुआ, जैसे प्रश्नों का अस्तित्व ही न होता। ईश्वर, जीव प्रकृति अनादि, अनुत्पन्न, अनादि, नित्य, स्वयंभू सत्तायें हैं। ईश्वर जीवात्माओं को उनके पूर्व जन्म व पूर्व कल्प के कर्मों के फलों को देने के लिए ही इस संसार की रचना व पालन करता है। इस सृष्टि को देखकर प्रमाणित होता है कि ईश्वर सर्वज्ञ अर्थात् सर्वज्ञानमय है। यदि ऐसा न होता तो यह संसार बन ही नहीं सकता था। विज्ञान के नियमों पर आधारित व निर्मित यह संसार हम सभी को प्रत्यक्ष है, अतः ईश्वर का सर्वज्ञ वा सर्वज्ञानमय होना सिद्ध है। इस सृष्टि को बनाने के कारण व इसमें सभी विद्याओं, ज्ञान व विज्ञान का उपयोग व समावेश होने के कारण ईश्वर संसार का प्रथम व प्रमुख ज्ञानी व विज्ञानी अर्थात् शीर्षतम वैज्ञानिक है। वेदों का अध्ययन और सृष्टि में ज्ञान व विज्ञान के नियमों का साक्षात्कार कर महर्षि दयानन्द ने आर्यसमाज का प्रथम नियम बनाया कि सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं उन सब का आदि मूल परमेश्वर है। यह नियम निर्विवाद रूप से सत्य है, अतः यह सिद्ध है कि ज्ञान व विज्ञान का दाता व निर्माता ईश्वर ही है। वैज्ञानिक सृष्टि में कार्यरत नियमों की खोज करते हैं जिनका प्रकाश व प्रयोग सृष्टि की उत्पत्ति करते समय ईश्वर ने किया है। सृष्टि में कार्यरत इन नियमों की खोज कर ही हमारे वैज्ञानिक उनसे अन्य मनुष्यों को लाभान्वित करने के उपाय ढूंढते हैं। अतः यह प्रमाणित होता है ज्ञान व विज्ञान का आधार व मूल भी ईश्वर तत्व व सत्ता है।

वेद क्या है? यह जानना भी उपयोगी व आवश्यक है। वेद ईश्वर का निजी ज्ञान है जिसे वह सृष्टि के आरम्भ में आदि चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा को संसार के हितार्थ देता है। इस ज्ञान को पाकर यह ऋषि अन्य सभी मनुष्यों वा स्त्री-पुरूषों में इस ज्ञान का प्रचार करते हैं जिससे संसार की पहली पीढ़ी के सभी मनुष्य ज्ञान व विज्ञान से परिचित व अभिज्ञ होते हैं। वेद ज्ञान की प्राप्ति की प्रक्रिया व इससे जुड़े सभी प्रश्नों का उत्तर महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने सत्यार्थ प्रकार में दिया है। विज्ञ पाठकों को इस पूरे प्रकरण को वहीं देखना चाहिये। वेदों का ज्ञान मनुष्य को ईश्वर की अनेक देनों में से एक बहुत बड़ी देन है। यदि ईश्वर सृष्टि की आदि में वेदों का ज्ञान न देता तो यह सिद्ध तथ्य है कि मनुष्य प्रयत्न करके भी भाषा की उत्पत्ति नहीं कर सकते थे और न हि अपने जीवन का सामान्य व्यवहार कर सकते थे। अतः ज्ञान व विज्ञान तथा मनुष्य के जीवन की रक्षा व उन्नति का आधार भी सृष्टि के आरम्भ व उसके बाद भी ईश्वर ही सिद्ध होता है। यहां यह भी उल्लेख कर दें कि हमारा शरीर व इसकी श्वसन प्रणाली व सभी अंग व उपांग हमें ईश्वर से ही मिले हैं। आधुनिक विज्ञान व दम्भी विद्वानों ने नास्तिकता की बातें फैला कर मनुष्य को ईश्वर की सत्य व यथार्थ सत्ता से दूर किया है। यह ध्रुव सत्य है कि ईश्वर व वेद मनुष्य जीवन के मुख्य आधार हैं जिनकी अनुपस्थिति में सृष्टि व मनुष्य आदि प्राणियों की उत्पत्ति व निर्वाह होना असम्भव था।

हमने लेख में ईश्वर, वेद व विज्ञान की चर्चा की है। अब वैज्ञानिकों के बारे में भी कुछ विचार करते हैं। हमारी दृष्टि में वैज्ञानिक वह है जो विज्ञान की किसी एकाधिक शाखा का अध्ययन कर उस ज्ञान को आत्मसात करता है और अधीत ज्ञान के आधार पर कुछ नये प्रयोगों, अनुसंधान व मनन करके उस विज्ञान की शाखा में नूतन आविष्कार करने सहित विद्यमान ज्ञान में कुछ नया जोड़ता व संशोधन करता है। इस आधार पर वैज्ञानिक विज्ञानसेवी व विज्ञानधर्मी मनुष्य को कह सकते हैं। विज्ञान में उसकी यह रूचि व प्रवृत्ति स्कूली शिक्षा व मित्रों व परिवार जनों की प्रेरणा सहित इस क्षेत्र में रोजगार की अच्छी सम्भावनाओं के कारण भी हुआ करती है। जो भी हो, वैज्ञानिक देश, विश्व व मानव जाति के लिए ऐसे कार्य करते हैं जिनका उद्देश्य ज्ञान व विज्ञान का विकास कर लोगों को उनके दैनन्दिन कार्यों में सहयोग व सुविधा प्रदान करना होता है। विज्ञान की इसी भावना व प्रवृत्ति से आज संसार ज्ञान की खोज के शिखर पर है। यह अलग बात है कि आज भी संसार के प्रायः सभी मतों के धार्मिक लोग अपनी पुरानी मध्यकालीन बातों पर ही टिके हुए हैं और आधुनिक बातों से कोई शिक्षा, प्रेरणा व लाभ उठाना नहीं चाहते। जहां तक ईश्वर और वेद की बात है यह अध्ययन व अनुसंधान के प्रेरक हैं। वेद वैदिक मान्यतायें विज्ञान सहित सदग्रन्थों के स्वाध्याय व अध्ययन को अपना नित्य दैनिक कर्तव्य मानते हैं। सिद्धान्त रूप में वेद यह भी स्वीकार करता है कि ज्ञान व विज्ञान ही मनुष्य को दुःखों से मुक्त करते हैं। यही कारण है कि वैदिक धर्म में आध्यात्मिक ज्ञान सहित अपरा अर्थात् भौतिक ज्ञान विज्ञान का सन्तुलित समावेश आदि काल से ही रहा है। प्राचीन काल में हमारे देश में विज्ञान सहित सभी विद्यायें पूर्ण विकसित थी। लाखों व करोड़ों वर्षों के काल की दूरी ने इनके विस्तृत ज्ञान से हमें वंचित कर दिया है। यह सम्भव है कि आज जो ज्ञान व विज्ञान की प्रगति है, वह आने वाले 5 या 7 हजार वर्षों बाद किन्हीं कारणों से उपलब्ध न हो। हो सकता है कि युद्धों, महायुद्धों व फिर भौगोलिक परिवर्तनों व आपदाओं से यह आंशिक व पूर्णतया अस्त-व्यस्त व नष्ट हो जायें। निष्कर्षतः विज्ञान ज्ञान के ही सूक्ष्मता से अध्ययन की एक कुछ-कुछ भिन्न शैली है और इसका अध्ययन करने वाले वैज्ञानिक कहलाते हैं। ईश्वर का स्वरूप, उसका ज्ञान व उपासना तथा ईश्वरीय ज्ञान वेद किसी भी प्रकार से विज्ञान के विरोधी नहीं अपितु सहयोगी व पोषक हैं। हम जितना जितना विज्ञान में आगे बढ़ेगें उतना-उतना हम उस विज्ञान के उत्पत्तिकर्ता ईश्वर के समीप पहुंचेंगे। हमें प्रयास करना चाहिये कि हमारा धर्म व सभी धार्मिक सिद्धान्त विज्ञान के पोषक हों। जो न हो उन्हें विचार कर ज्ञान-विज्ञान के अनुकूल कर देना चाहिये। ऐसा होना आज के समय में आवश्यक है। हमारा अनुमान है कि जो धर्म व मत विज्ञान की उपेक्षा करेगा वह आने वाले समय में टिक नहीं सकेगा। ज्ञान व विज्ञान का पूरक शुद्ध अध्यात्म केवल वेद, उपनिषदों व दर्शनों में ही प्राप्त होता है।

हमारा इस लेख को लिखने का प्रयोजन ईश्वर, वेद व विज्ञान को एक दूसरे का पूरक व अविरोधी बताना था जो कि वस्तुतः है। इसी के साथ लेख को विराम देते हैं।

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