(1) बरहमचारियों के लि मांसभकषण का सरवथा निषेधः-

बरहमचारी और बरहमचारिणी मदय मांस गनध माला रस, सतरी और परष का संग, सब खटाई, पराणियों की हिंसा, अंगों का मरदन, विना निमितत उपसथेनदरिय का सपरश, आंखों में अंजन, जूते और छतर का धारण, काम करोध लोभ मोह, भय शोक ईरषया दवेष नाच गान और बाजा बजाना, दयूत, जिस किसी की कथा, निनदा, मिथया-भाषण, सतरियों का दरशन, आशरय, दूसरे की हानि आदि ककरमों को सदा छोड़ देवें। स॰पर॰पृ॰ 136 द॰ पर॰

(2) गृहसथियों के लि मांसभकषण का सरवथा निषेधः-

मृगया अरथात शिकार खेलना, दयूत और परसननता के लि भी चैपड़ आदि खेलना, दिन में सोना, हसी ठठा मिथयावाद करना, सतरियों के साथ सदा अधिक निवास में मोहित होना, मदयपानादि शाओं का करना, गाना, बजाना, नाचना वा इन का देखना और वृथा इधर उधर घूमते फिरना ये दश दरगणा काम से होते हैं। ये अठारह दरगणा हैं इनकों राजा अवशय छोड़ देवे। सं॰वि॰पृ॰ 176 द॰ पर

नोट - यहां मदयपानादि में मांसभकषण भी आ जाता है।

(3) अनयवरगों के लि मांसभकषण का सरवथा निषेधः-

नोट - यहां पर संनयासी का करतवय बताते ह सवामी जी लिखते हैः-

अपने आतमा और परमातमा में सथिर, अपेकषारहित, मदय- मांसादिवरजित होकर, आतमा ही के सहाय से सखारथी होकर, इस संसार में धरम और विदया के बढ़ाने में उपदेश के लि सदा विचरता रहे। म॰पर॰पृ॰ 230 द॰ पर॰

(4) मांस-भकषण का सबके लि निषेधः-

हिंसकः देखो ईशवर ने परषों के दात कैसे पैने, मांसाहारी पशओं के समान बना हैं, इस से हम जानते है कि मनषयों को मांस खाना उचित है।

रकषकः- जिन वयाघरादि पशओं के दात के दृषटानत से अपना पकष सिदध किया चाहते हो कया तम भी इसके तलय ही हो ? देखो, तमहारी मनषयजाति उनकी पश-जाति, तमहारे दो पग और उनके चार, तम विदया पढ़कर सतयासतय का विवेक कर सकते हो वे नहीं। और वह तमहारा दृषटानत भी यकत नहीं कयोंकि जो दांत का दृषटानत लेते हो तो बनदर के दांतो का दृषटानत कयों नहीं लेते ? देखो बनदरों के दांत सिंह और बिलली आदि के समान है और वे मांस नहीं खाते। मनषय और बनदर की आकृति भी बहत सी मिलती है। इसलि परमेशवर ने मनषयों को दृषटानत से उपदेश किया है कि जैसे बनदर मांस कभी नहीं खाते और फलादि खाकर निरवाह करते है वैसे तम भी किया करो। जैसा बनदरों का दृषटानत सांगोपांग मनषयों के साथ घटना है वैसा अनय किसी का नहीं इसलि मनषयों को अति उचित है कि मांस खाना सरवथा छोड़ देवें।

हिंसकः- ये जितने उततर कि ये सब वयवहार समबनधी है। परनत पशओं को मार के खाने में अधरम तो नहीं होता? और जो होता होगा तो तम को होना होगा। कयोंकि तमहारे मत में निषेध है। इसलि तम मत खाओं और हम खायें। कयोंकि हमारे मन में मांस को खाना अरधम नहीं।

रकषकः- हम तमसे पूछते है कि धरम और अधरम वयवहार ही में होते हैं व अनयतर? तम कभी सिदध  न कर सकोगे कि वयवहार से भिनन धरमाधरम होते है। जिस-जिस वयवहार से दूसरों को हानि वह अधरम और जिस-जिस वयवहार में उपकार हो वह धरम कहाता है। तो लाखों के सख लाभकारक पशओं का नाश करना अधरम और उनकी रकषा से लाखों को सख पहचाना धरम कयों नहीं मानते? देखो चोरी जारी आदि करम इसलि अधरम है कि इनसे दूसरे की हानि होती है। नहीं तो जो जो परयोजन धनादि से उनके सवामी सिदध करते है वे ही परयोजन उन चोगदि भी सिदध होते है। इसलि यह निशचित है कि जो जो करम जगत में हानिकारक है वे वे अधरम और जो जो परोपकार है वे वे धरम कहाते हैं। जब क आदमी की हानि करने से चोरी आदि करम पाप से गिनते हो तो गवादि पशओं को मार के बहतों की हानि करना महापाप कयों नहीं? देखो मांसाहारी मनषयों में दयादि उततम गण होते ही नहीं। किनत वे सवारथवश होकर दूसरे की हानि करके अपना परयोजन सिदध करने ही में सदा रहते हैं। जब मांसाहारी किसी पषट पश को देखता है तभी उसकी इचछा होती है कि इसमे मांस अधिक है मार कर खाऊं तो अचछा है और जब मांस का न खाने वाला उस को देखता है तो परसननता होता है कि यह पश आननद में है। जैसे सिंह आदि  मांसाहारी पश किसी का उपकार तो नहीं करते किनत अपने सवारथ के लि दूसरे का पराण भी ले मांस खाकर अति परसनन होते हैं, वैसे ही मांसाहारी मनषय भी होते है। इसलि मांस का खाना किसी मनषय को उचित नहीं। गो॰ नि॰ पृ॰ 926 द॰ पर॰

नोट - सवामी जी महाराज जी ने गोकरणानिधि में पृ॰ 926 से लेकर पृ॰ 930 तक क हिंसक-रकषक-संवाद लिखा है। इस विषय में जिजञास भाइयों को उस संवाद का आदयोपानत मनन करना चाहि।

इसी विषय में इसी पृषठ पर आगे लिखा है। गो॰ नि॰ पृ॰ 926 द॰ पर॰

हिंसकः- जिन पशओं और पकषियों अरथात जंगल में रहने वालों से उपकार किसी का नहीं होता और हानि होती है उनका मांस खाना वा नहीं?

रकषकः- न खाना चाहि, कयोंकि वे भी उपकार में आ सकते है। देखो 100 भंगी जितनी शदधि करते है उन से अधिक क सूअर व मरगा, अथवा मोर आदि पकषी सरप आदि की निवृतति करने से पवितरता और अनेक उपकार करते है और जैसे मनषयों का खान-पान दूसरे के खाने-पीने से उनका जितना अनपकार होता है वैसे जंगली मांसाहारी का अनन जंगली पश और पकषी है। और जो विदया वा विचार से सिंहादि वनसथ पश और पकषियों से उपकार लेवें तो अनेक परकार का लाभ उससे भी हो सकता है। इस कारण मांसाहार का सरवथा निषेध होना है।

स॰ पर॰ पृ॰ 22॰ द॰ पर॰ इस विषय में इस परकार लिखा हैः-

जब ऑालमभ अरथात घोड़े को मार के अथवा गवालमभ गा को मार के होम करना ही वेदविहिन नहीं हैं। तो उसका कलियग में निषेध माना जा तो तरेता आदि में विधि आ जा। तो इस में से दषट काम का शरेषठ यग मे होना सरवथा असंमभव है। और संनयास की वेदादि शासतरों में विधि है उसका निषेध करना निरमूल है। जब मांस का निषेध है तो सरवथा ही निषेध है।

(5) मांसभकषण दषट वयसन है।

सवायंभव राजा से लेकर पाणडव परयनत आरयों का चकरवरती राजय था। ततपशचात आपस के विरोध से लड़ कर नषट हो ग कयोंकि परमातमा की इस सृषटि में अभिमानी अनयायकारी अविदवान लोंगो का राजय बहत दिन नहीं चलता। और यह संसार की सवाभाविक परवृतति है कि जब बहत सा धन असंखय परयोजन से अधिक होता है। तब आलसय परषारथ रहितता, ईरषया, दवेष विषयाशकति और परमाद बढ़ता है। इस से देश में विदया सशिकषा नषट होकर दरगण और दषट-वयसन बढ़ जाते है। जैसे कि मदय-मांससेवन, बालयावसथा में विवाहः- स॰ पर॰ पृ॰ 402 द॰ पर॰दध

जो ये सात दरगण दोनों कामज और करोधज दोषों में गिने हैं इन में से पूरव 2 अरथात वयरथ से कठोर वचन, कठोर वचन से अनयाय, से दणड देना, इस से मृगया खेलना, इस से सतरियों का अतयनत संग, इस से जआ अरथात दयूत करीडा और इससे भी मदयादिसेवन करना बड़ा दषट वयसन है। स॰ पर॰ पृ॰ 248 द॰ पर॰

नोट:- यहां भी मदयादि में मांसभकषण आ जाता है।

(6) मांस-भकषण अनयाय हैः- गो॰ नि॰ पृ॰ 927 द॰पर॰। जो परतयेक दृषटानत देखना चाहो तो क मांसाहारी का क दूध घी और अननाहारी मथरा के मलल चैबे से बाहयदध हो, तो अनमान है कि चैबा मांसाहारी को पटक उस की छाती पर चढ़ ही बैठेगा। पनः परीकषा होगी कि किस के खाने से बल नयून और अधिक होता है। भला तनिक विचार करो कि छिलकों के खाने से अधिक बल होता है, अथवा रस जो सार है उसे खाने से? मांस छिलके के समान और दूध घी साररस तलय है। इसको जो यकतिपूरवक खावे तो मांस से अधिक गण और बलकारी होता है। फिर मास का खाना वयरथ और हानिकारक अनयाय अधरम और दषट-करम कयों नहीं (अरथात दषट करम है)

(7) मांस-भकषण अधरम है।

नोटः- उपरिलिखित गो॰ नि॰ के 927 पृ॰ के उ(रणों जहां पर सवामी जी महाराज मांसभकषण को दषट करम ठहराते है वहां ही इसे अधरम भी लिखते है। वाममारगियों के पदयमकारों वाले शलोक को उदधृत करके उनका खणडन करते ह सवामी जी महाराज पनः इसी विषय में स॰पर॰पृषठ 410 पर॰मा॰ में लिखते है।

अरथात देखो इन गवरग णड पोपों की लीला कि जो वेदविरदध महा अधरम के काम हैं उनहीं को शरेषठ वाममारगियों ने माना। मदय, मांस, मीन अरथात मछली, मदरा, पूरी कचैरी और बडे़ रोटी आदि चरवणा, योनि पातराधार मदरा और पांचवा मैथन अरथात परष सब शिव और सतरी सब पारवती के समान मान कर ”अहं भैरवसतवं भैरवी हयावयोरसत संगमः“ चाहे कोई परष वा सतरी हो इस ऊट-पटांग वचन को पढ़ के समागम करने में वे वाममारगी दोष नहीं मानते।

नोटः- यहां इन पंच मकारी को सवामी जी महाराज मदय अधरम के काम मानते है और इस कारण वाममारग का खणडन कर रहे है। इन पंच मकारों में क मांसभकषणा भी है।

(8) मांस-भकषण कलकषण है- स॰ पर॰ पृ॰ 388 द॰ पर॰।

”आरयावरत देशवासियों का आरयावरत देश से भिनन 2 देशों में जाने से आचारभरषट हो जाते है या नहीं“। इस परशन का उततर देते ह और यह दरशाते ह कि हमारे पूरवज वयापार और विजय-यातरादि के लिये-देशांतरी और दवीप-दवीपानतरों में जाया करते थे सवामी जी महाराज इस विषय में लिखते ह, शंका करते है-

”यह केवल मूरखता की बात नहीं तो और कया है“ हां इतना कारण तो है कि जो लोग मांस-भकषण और मदयपान करते हैं उनके शरीर वीरयादि धात भी दरगनधि से दषित होते हैं इसलि उनके संग करने से आरयों से भी यह कलकषण न लग जाय, यह तो ठीक है।

(9) मांसभकषण महापाप है                                    स॰पर॰पृ॰ 661-662 द॰ पर॰।

समीकषकः- अब सनिये! ईसाईयों में पाप करने से कोई धनाढय भी नहीं डरता होगा और न दरिदर, कियोंकि इन के ईशवर ने पापों का परायशचित करना सहज कर रखा है। क यह बात ईसाईयों की बाईबल में बड़ी अदभत है कि बिना कषट किये पाप से पाप छूट जा कयोंकि क तो पाप किया और दूसरे जीवों की हिंसा की और खूब आननद से मांस खाया और पाप भी छूट गया।

नोटः- यहां बाईबल में लिखे मांसभकषण से पापों के परायशचित पर सवामी जी महाराज शंका करते है ”बिना कषट किये पाप से पाप छूट “ यह पंकति विशेष विचारणीय है। यहां सपषट मांसभकषण को पाप माना गया है। इसी विषय में गो॰ नि॰ पृ॰ 122 द॰ पर॰ माला पर क गौ कितने मनषयों को लाभ पहचाता है इसकी गणना करते ह सवामी जी महाराज लिखते है-

दूध और अनन को मिला कर देखने से निशचय है कि 410440 मनषयों का पालन क बार के भोजन से होता है। अब छः गाय की पीढ़ी पर पीढि़यों का हिसाब लगाकर देखा जाये तो असंखय मनषयों का पालन हो सकता है। और इस के मांस से अनमान है कि केवल अससी मांसाहारी मनषय क बार तृपत हो सकते है। देखो तचछ लाभ के लिये लाखों पराणियों को मार असंखय मनषयों की हानि करना महापाप कयों नहीं? (अरथात महापाप है।)

 

इसी विषय में आगे लिखा हैः- गो॰ नि॰ पृ॰ 924-25 द॰ पर॰

इसलिये यजरवेद के परथम ही मनतर में परमातमा की आजञा है कि (अघनयाः + यजमानसय पशून पाहि) हे परष! तू इन पशओं को कभी मत मार, और यजमान अरथात सब के सख देने वाले जनों के समबनधी पशओं की रकषा कर, जिन  से तेरी भी पूरी रकषा होवे। और इसी लिये बरहमा से लेकर आजपरयनत आरय लोग पशओं की हिंसा में पाप और अधरम समते थे और अब भी समते है।

(10)  मृगया (शिकार खेलना) महादषट वयसन है-                               स॰ पर॰ पृ॰ 142 द॰ पर॰

काम के वयसनों में बड़े दरगण, क मदयादि अरथात मदकारक दरवयों का सेवन, दूसरा पांसों आदि से जआ खेलना, तीसरा सतरियों का विशेष संग, चैथा मृगया खेलना, ये चार महा दषट वयसन है।

नोटः- सं॰ 2 तथा 5 देखिये।

(11) मांसभकषी राकषस हैं स॰ पर॰ पृ॰ 277 द॰ पर॰।

”जो उततम तमोगणी है वे चारण जो कि कविता दोहादि बना कर मनषयों की परशंसा करते है” सनदर पकषी, दामभिकपरष अरथात अपने सख के लिये अपनी परशंसा करने हारे, राकषस जो हिंसक, पिशाच, अनाचारी अरथात मदयादि के आहारकतरता और मलिन रहते है वह उततम तमोगण के करम का फल है।

(12) मांसाहारी मलेचछ हैं। स॰ पर॰ पृ॰ 392 द॰ पर॰।

जो जो बदधि का नाश करने वाले पदारथ है उनका सेवन कभी न करें और जितने अनन सड़े, बिगड़े दरगनधादि से दूषित, अचछे परकार न बने ह, और मदयमांसाहारी मलेचछ कि जिनका शरीर मदयमांस के परमाणओं से ही पूरित है उनके हाथ का न खावें।

नोटः- वहां सवामी जी महाराज ने मदयमासाहारियों को ही मलेचछ नाम दिया है।

(13) मांस-भकषण घातक और हिंसक हैं।

अनमति ;मारने की सलाहदध देने, मांस के काटने, पश आदि के मारने, उनको मारने के लिये लेने और बेचनें, मांस के पकाने, परसने और खाने वाले आठ मनषय घातक हिंसक अरथात ये सब पापकारी हैं।       गो.नि.पृ.930.द.पर.।

(14) मांसाहारी अपराधी हैं और मांसाहारियों के हाथ का खाना उचित नहीं। स॰ पर॰ पृ॰ 391 द॰ पर॰।

हां! मसलमान ईसाई आदि मदयमांसाहारियों के हाथ के खाने में आरयों को भी मदयमांसादि खाना पीना अपराध पीछे लग पड़ता है।

(15) मांसाहारी परपंची होते हैं।                           स॰ पर॰ पृ॰ 659 द॰ पर॰।

अब विचारिये ईसाईयों का परमेशवर गा बैल आदि की भेंट लेने वाला जो कि अपने लिये अपने लिये बलिदान कराने के लिये उपदेश करता है वह बैल गा आदि पशओं के लोहू मांस का भूखा पयासा है वा नहीं? इसलिये वह अहिंसक और ईशवरकोटि में गिना कभी नहीं जा सकता। किनत मांसाहारी परप´ची मनषय के सदशय है।

(16) मांसभकषक विशवासघाती है।

देखिये! जो पश निःसार घास तृण पतर फल फूलादि खावें और सारदूधादि अमृत रपी रततन देवें, हल, गाड़ी आदि में चल के अनेक विधि अनादि उतपनन कर सब के बल-बदधि पराकरम को बढ़ा के नीरोग करें, पतर पतरी और मितरादि के समान परषों के साथ विशवास और परेम करें, जहां बांधें वहा बंधे रहे, जिधर चलावे उधर चलें, जहां से हटावें वहां से ही हट जावें, देखने और बलाने पर समीप चले आवें, जब कभी वयाघरादि पश वा मारने वाले को देखें अपनी रकषा के लिये पालन करने वाले के समीप दौड़ कर आवें कि यह हमारी रकषा करेगा, जिनके मरने पर चमड़ा भी कणटक आदि से रकषा करे, जंगल में चर के अपने बचचे और सवामी के लिये दूध देने को नियत सथान पर नियत समय चले आवे, अपने सवामी की रकषा के लिये तन मन धन लगावें, जिनका सरवसव राजा और परजा आदि मनषयों के सख के लिये है, इतयादि शभ-गणयकत सख-कारक पशओं के गले छर

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