महरषि दयाननद सरसवती ने सचचे शिव की खोज में 18 वरष की अवसथा में अपने घर व परिवार का परितयाग किया। घर पर रहकर वह अपना उददेशय पूरा नहीं कर सकते थे। वह 36 वरष की अवसथा तक अपने उददेशय की पूरति हेत यतर-ततर भरमण करते ह सन 1960 में मथरा में वेद, आरष गरनथों के पारदरशी  विदवान परजञाचकष सवामी विरजाननद सरसवती की पाठशाला में पहंचें। उनके पास 3 वरष तक रहकर आरष वयाकरण पाणिनी-अषटाधयायी-महाभाषय-निरूकत पदधति सहित वैदिक साहितय का अधययन किया जिससे वह अपने लकषय व उसकी परापति के साधनों को पूरणतया जान सके। अधययन समापति पर गरू-दकषिणा के अवसर पर गरूजी ने उनसे अपना सारा जीवन वेदों के पनरूदधार में लगाने व देश से अनारष जञान को हटा कर उसके सथान पर वेद व आरष कहे जाने वाले ऋषियों के जञान को सथापित करने के लि वचन लिया। महरषि दयाननद ने गरू को उनकी इचछानसार कारय करने का वचन दिया और वहां से कछ दूरी पर आगरा में अवसथित होकर लगभग 18 माह तक गहन चिनतन-मनन-विचार कर योजना को अनतिम रूप दिया। सा परतीत होता है कि उनकी योजना में अवतारवाद, मूरति पूजा, बाल व बेमेल विवाह, अशिकषा, फलित जयोतिष, अनधविशवासों, करीतियों व असतय मतों का खणडन, वैदिक मत को तरक, परमाणों व यकतियों से परसतत करना तथा उनका मणडन करना, सतय मत की सथापना के लि शासतरारथ, वारतालाप, शंका समाधान आदि का आशरय सममिलित था। अधययन व विचार करने पर हमें लगता है कि लेखन कारयो को महतव देना, मणडन व खणडन से समबनधित किसी गरनथ का निरमाण करना, वेदों का भाषय करना, संसकारों व ईशवर की परारथना-विनय पर पसतक या गरनथों की रचना का विचार यहां उनमें परादूरभूत नहीं हआ था। हिनदी भाषा उनके उपदेशों व परवचनों की भाषा हो, इसका भी विचार या निरणय उनहोंने नहीं लिया था। वह संसकृत में वारतालाप वं इसी में उपदेश दिया करते थे। आरय समाज जैसी किसी संसथा की सथापना का विचार भी उनके मन व मसतिषक में नहीं था। वह गरू को दिये ह वचन के अनसार कारय आरमभ कर चके थे। आगरा से आगे भी जाना था। वह वहां से गवालियर की ओर चले और जहां भी जाते वहां पौराणिक व कथित सनातनधरम के अनयायियों से मिलकर उनहें वैदिक धरम का उपदेश करते, मूरति पूजा आदि अवैदिक कृतयों का खणडन करते तथा विपकषियों व विरोधियों को शासतरारथ की चनौती देते। इस करम में काशी के आननद बाग सथान में 16 नवमबर, सन 1869 ई. को काशी नरेश शरी ईशवरीनारायण सिंह की अधयकषता में वहां के 27 परमख पणडितों से मूरति पूजा को वेदों से सिदध करने पर शासतरारथ हआ। लगभग 50 हजार दरषकों में 2 पादरी भी उपसथित थे। इस शासतरारथ से उनका यश व कीरति न केवल देश में अपित विशव के कछ देशों तक भी जा पहंची थी। इस घटना ने सारे देश को परभावित किया था। सभी विदवानों व पणडितों के मूरतिपूजा के संसकार इस अवैदिक कृतय से गहराई से जड़े ह थे। सवारथ भी इसको न छोड़ने के परमख कारणों में से क था। उन काशी के पणडितों की सभी यकतियां, तरक व परमाण असतय सिदध हो जाने पर भी उनके मानने वालें वेदों के सतय मत जो ईशवर को सचचिदाननद, अजनमा, शरीर व नस-नाड़ी के बनधनों से रहित, निराकार, सरववयापक, सरवजञ, सृषटिकरता, जगत का धारक व पालक, करम-फल-वयवसथा का संचालक मानता है, वेदों के उस पूरण सतय को सवीकार करने के लि सहमत नहीं थे। न केवल वह अपने अवैदिक मत में सथित रहे अपित अपने अनयायियों में भी असतय का आशरय लेकर नाना परकार के भरम उतपनन करते रहे जिससे सतय पूरी तरह सथापित नहीं हो सका और देष अनधविशवासों, पाखणड, करीतियों व अजञान से मकत नहीं हो सका।

इस घटना से महरषि दयाननद की देश भर में परसिदधि हो जाने से यतर-ततर लोग उनके दरशन करने, उनका सतसंग परापत करने और उनसे लाभानवित होने के लि समपरक करने लगे। यदयपि उनहोंने देश के अधिकांश भागों का भरमण कर वहां वेदोपदेश व सतय व असतय का मणडन व खणडन किया, तथापि उनके पूना में ह परवचनों का विशेष महतव है। इन परवचनों में से 15 परवचन नोट कर सरकषित कर लिये गये थे जो बाद में मराठी व उससे अनदित होकर हिनदी आदि अनय भाषाओं में परकाशित ह। आज यह पूना परवचन आरय समाज के विदवानों व अनयायियों के लि बहत ही महतवपूरण गरनथ है जिसमें अनेक दरलभ जानकारी उपलबध है। 10 अपरैल, सन 1875 को महरषि दयाननद ने अपने परमख कारयो में से क कारय, आरय समाज की काकड़वाड़ी, ममबई में सथापना की। आरय समाज की सथापना न केवल आरय समाज के इतिहास में अपित देश व विशव के इतिहास की क परमख घटना है। अब यह आवशयक हो गया कि आरय समाज के विधिवत व सचारू रूप से संचालन के लि उसके नियम व उपनियम निशचित हों व लेखबदध हों। आरय समाज की मानयताओं का अपना क गरनथ होना भी आवशयक था। यह गरनथ सतयारथ परकाश ही हो सकता था जिसे महरषि दयाननद ने कछ समय पूरव ही राजा जयकृषणदास, डिपूटी कलेकटर, काशी की परेरणा पर रचा था और राजाजी ने ही इसका परकाशन भी किया था। इस गरनथ में परथम 12 समललास ही छपे थे। राजाजी ने 13 व 14 हवें समललास परकाशित नहीं कराये जिसका कारण इसमें ईसाई व मसलिम मत की समीकषा थी। सा परतीत होता है कि इस समीकषा को यदि परकाशित कर दिया जाता तो सा होने पर अंगरेज सरकार, मनमोहन कमार आरय ईसाई मत व मसलिम मत के पादरियों व मौलवियों का विरोध व कोप महरषि दयाननद व आरय समाज के विरूदध भयंकर रूप में सामने आता। हो सकता था कि सवामी दयाननद ने उसके परकाशन के बाद अकतूबर, 1883 तक जो वेद परचार व अनय कारय किये, वह सब परभावित होते या सा भी हो सकता था कि उनको परचार से रोक दिया जाता जिनमें उनकी हतया कराया जाना भी हो सकता था। हमें तो विचार करने पर सा भी लगता है कि महरषि दयाननद की मृतय के सतय कारण परकाश में नहीं आये हैं। उनहें रातरि में विषयकत दगध का पान कराने वाले को पकड़कर पूछताछ भी नही की गई। न ही आरय समाज व महरषि के भकतों ने इसकी कोई मांग की? महरषि ने भी अपनी ओर से इसके कारणों पर कछ नहीं कहा और न सनदेह वयकत किया। जिस जगननाथ रसोईये को विषपान कराने वाला कहा जाता है, उस नाम का रसोईयां था भी या नहीं, था तो वह कहां का रहने वाला था, कब, कैसे व कहां वह महरषि के साथ जड़ा, रसोईया बना, इसका विवरण हमारी दृषटि में नहीं आया है? ननहीं भगतन के बारे में सनदेह है कि आलोचना के कारण उसने इस कृतय को अंजाम दिया था। यह बात सतय हो सकती है परनत इसके पीछे अनय षड़यनतरकारी सहायक रूप में हो सकते हैं। अंगरेज सरकार व उसके अधिकारियों का भी कछ गपत सहयोग व षडयनतर तो नहीं था? इसकी तो कोई जांच नहीं हई और न किसी ने शक ही किया। जांच समभव भी न थी कयोंकि अंगरेज देश के शासक थे। शरी आदितयपाल सिह आरय के अनसार सतयारथ परकाश के दूसरे संशोधित संसकरण में गयाहरवें समललास में बाघेर लोगों की वीरता की परशंसा की घटना का अंगरेजों को जञान हो जाने पर यही उनकी मृतय का कारण बनी थी। सपषट परमाण न होने से सनदेह तो किया ही जा सकता है और वह सतय व असतय दोनों हो सकता है।

सतयारथ परकाश का सवाधयाय करते ह यह परशन भी बहधा आता है कि ऋषि दयाननद ने यह गरनथ कयों लिखा? इस परशन का उततर, क अनय परशन के उततर में निहित है कि यदि वह यह गरनथ न लिखते तो कया होता? हम समते हैं कि सन 1875 व उससे पूरव देश भर में धरम के नाम पर नाना परकार के करमकाणड, उचित-अनचित वयवहार, ईशवरोपासना के नाम पर भिनन-भिनन व परसपर विरूदध उपासना-पदधतियां असतितव में थी। यह सब सतय परमपराओं के विसमृत होने, आलसय, अजञान व अविदया की वृदधि के कारण असतितव में आईं थीं। मूरतिपूजा, भिनन-भिनन मनदिरों में मूरतियों के दरशन, पाषाण व धातओं की मूरतियों को भोग लगाना, उनके आगे सिर नवाना या हाथ जोड़कर उनहें सममान देना, उनहें वसतर पहनाना, उनसे सख-समृदधि-आरोगयता व मनोरथों की सिदधि की कामना व भावना-परारथना, वृकष-पूजा, नदियों में सनान या नदियों व मनदिरों को तीरथं मानना व वहां आना जाना, यतर-ततर यजञ का विकृत रूप, तलसीदास कृत राम चरित मानस का पाठ व उसका ही यजञ, आरती, भजन, कीरतन आदि नाना परकार के करमकाणड असतितव में थे। किसी को यह पता नहीं था कि यह सब ईशवरोपासना कयों व कैसे है? इनके उततर किसी के पास नहीं थे और आज भी नहीं हैं। इनके उततर कोई किसी से पूछता था, न कोई विचार करता था और न हि कोई किसी को बताता था। इसी परकार से सामाजिक वयवहार पर दृषटि डालें तो पाते हैं कि समाज जनम के आधार पर निरधारित नाना जातियों में विभकत था। यह सब कृतरिम जातियां समान नहीं थी अपति इनमें ऊंच-नीच का भाव विदयमान था। नीच कहे जाने वाली जाति के मनषय उचच जाति के मनषयों के साथ सामानय रूप से उठ-बैठ नहीं सकते थे, अधययन-अधयापन, खान-पान का वयवहार नहीं होता था, शादी-विवाह, मितरता, कंवें व तालाब से जल लेने में भी ऊंच-नीच आड़े आती थी। निमन वरग का वयकति उचच वरग के कारय या वयवसाय भी नहीं कर सकता था। निमन जाति के बनध अमानवीय व नारकीय जीवन वयतीत करते थे जिसका कारण उचच जाति के तथाकथित लोगों का अहंकार, अजञान व सवारथ था। कहने का भाव यह है कि समाज में सरवतर विषमता, असमानता व सचचे समाजिक वयवहार के जञान व तदानसार वयवहार का अभाव था। महरषि जहां-जहां जाते व जो भाषण देते वह शरोताओं को परिय लगते थे। वह चाहते थे कि काश, उनहें सवामी दयाननद की हर बात समरण रह पाती, परनत यह असमभव था। अतः राजा जयकृषण दास जी ने अपने अनभव व इचछा को सवामी जी को इन शबदों में निवेदन किया कि महाराज, आप जो उपदेश देते हैं वह बहत उपयोगी होते हैं, परनत उनका परभाव आपके परवचन के उपसथित लोगों पर कछ घणटों व दिनों तक ही रहता है। बाद में वह मखय व परमख उपयोगी बातें विसमृत हो जाती है। यदि आप अपनी मानयताओं का क गरनथ दिख दें, तो इससे यह लाभ होगा कि आपके सभी विचार, मानयतायें व सिदधानत चिरसथाई हो जायेगें। इससे वह लोग जो आपके उपदेशों को सनने सभा-सतसंग सथल पर नहीं आ पाते, वह दूर सथानों पर होकर भी लाभानवित हो सकते हैं और साथ हि विपकषियों व विरोधियों को भी इससे विचार-चिनतन-खणडन-मणडन व सतय व असतय को जानने में सहायता मिलेगी। इसका अनय लाभ यह भी होगा कि दीरघकाल तक यह धारमिक व सामाजिक विषयों में भारतीय परजा का मारगदरशन करेगें। सवामीजी इस परसताव के मरम को सम गये और उनहोंने इसे ततकाल सवीकार कर लिया और कछ ही महीने, परसताव के लगभग साढ़े तीन महीने बाद, यह गरनथ सतयारथ परकाश नाम से तैयार हो गया। इस गरनथ के परकाशित होने पर जीवन के सभी वैचारिक, मानसिक, आतमिक महतवपूरण पहलओं, धरम, अधरम, ईशवर-जीवातमा-सृषटि का यथारथ सवरूप, भकषय-अभकषय, जनम, मृतय, मोकष, बनधन, वेद, विदया, अविदया आदि अनेकानेक विषयों पर वैदिक मानयताओं का जञान लोगों को हआ। इस गरनथ के लिपिकर, मदरण से जड़े लोग तथा सवयं गरनथ के परसतावक व परकाशक पौराणिक विचारों के थे, अतः मांसाहार, मृतक शरादध व मूरति पूजा आदि विषयों में गरनथकरता के आशय के विपरीत कछ विचार गरनथ में इन लोगों ने सवेचछाचार से परकाशित कर दि। इतना होने पर भी जो विषय निरविवाद रहे, उनका साधारण जनों में जञान होना उस समय की क बहत बड़ी करानति थी। अब जिन मतों, मानयताओं, सिदधानतों, करमकाणडों, विचारों, रीति-रिवाजों, धरम, संसकृति व सभयता से जड़े विचार व जिनका खणडन गरनथ में था, उससे देश का सारा जनमानस परभावित हआ। समय-समय पर लिपिकर, मदरण व शबद-संयोजन करने वाले परेस करमचारी व परकाशक की ओर से की गई अशदधियां, परिवरतन व मिलावट गरनथकरता सवामीजी महाराज के धयान में लोगों दवारा परसतत की जाती रहीं। इसका लाभ यह मिला कि गरनथकरता ने अति वयसत होने पर भी इस गरनथ का नया संसकरण तैयार करने का निरणय किया जो यदयपि उनकी मृतय के बाद परकाशित हआ परनत इसका महतव व परभाव परथम संसकरण से कहीं अधिक है। महरषि के समय में वेदों में ईशवर के लि परयकत अनेक नामों के कारण वेदानयायियों को बह-ईशवरवादी माना जाता था। महरषि दयाननद ने सपरमाण सिदध किया कि वेदों में आये ईशवर के सभी नाम गणवाचक या समबनधसूचक आदि हैं। यह क ही ईशवर के भिनन-भिनन नाम हैं वं इन शबदों व नामों का समावेश कमातर ईशवर नामी सतता में है। सतयारथ परकाश के पहले समललास में महरषि दयाननद ने ईशवर के 100 नामों का उललेख कर व उनके अरथ, गण व समबनधों को सूचित कर सिदध किया है कि वेद केशवरवाद को मानने वाले गरनथ हैं। दूसरे समललास में मखयतः बाल शिकषा का विषय है। महरषि के काल में बालक-बालिकाओं के माता-पिता, यहां तक कि आचारयो को जञान ही नहीं था कि बचचों को कया शिकषा दी जानी चाहिये? महरषि दयाननद ने इस समललास को लिखकर इस आवशयकता की पूरति की। तीसरे समललास में अधययन-अधयापन का विषय है। इस अधयाय में ऋषि ने परसंगानसार गायतरी मनतर का अरथ, यजञ-अगनिहोतर, उपनयन, बरहमचरय उपदेश, पठनपाठनविधि तथा सतरी-शूदराधययन-विधि आदि पर परकाश डाला है। महरषि दयाननद यजरवेदीय मनतर ‘‘यथेमां वाचं कलयाणीमवदानि जनेभयः। बरहमराजनयाभयाम शूदराय चारयाय च सवाय चारणय।।’’ के आधार पर शूदरों व सतरियों सहित मानवमातर को वेदाधययन का अधिकार सिदध करते हैं। इस परमाण की उपसथिति में सतरी- शूदरों के वेदाधययन में कहीं कोई बाधा न रही। हमारी अपनी दृषटि में सतरियों को वेदाधययन का अधिकार इस लि भी वेदसममत, तरक व यकति से सिदध है कि जो सतरी बराहमण से विवाह करेगी वह बराहमणी कहलायेगी। बराहमण विदया के पढ़ने व उसका अधययन-अधयापन करने व कराने से होता है। यदि यह गण उसकी सतरी बराहमणी में नहीं होगें तो वह बराहमणी तो कदापि कहला नहीं सकती, जञान शूनय सतरी तो तो शूदरा ही कही जा सकती है। इसी परकार किसी शूदर कल या परिवार में जनमें बालक या बालिका की बदधि यदि अनय वरण के बालक-बालिकाओ की भांति विदया गरहण करने में सकषम व समरथ है, तो उनहें विदया के गरहण करने से वंचित करना अनयाय, पकषपात,

सवारथ, अजञान की शरेणी में आता है। जिनकी सी सोच हो वह बराहमण तो कदापि नहीं हो सकते। उनहें आरयो की शरेणी में रखना आरय शबद के अरथ के विपरीत है। उनहें तो अनारय, वेद-अनभिजञ, वेदविरोधी, सवारथी, अजञानी, अनाड़ी ही कह सकते हैं। विदयाधययन व वेदाधययन में सभी चार वरणो के बालक-बालिकाओं का पूरण व समान अधिकार है। पराचीन काल में सा उललेख मिलता है कि शूदरों को यजञोपवीत को धारण करने का अधिकार नहीं दिया गया था या विदयाधययन करते समय उसे यजञोपवीत से वंचित किया जाता था। हमारा मानना है कि उपनयन में यजञोपवीत परापत कर ही कोई बालक अधययन-विदयारजन-वेदाधययन का अधिकारी होता है। शूदरों सहित सभी सतरी-परूषों व उनके बचचों को यजञोपवीत धारण करने का उतना ही अधिकार है जितना कि बराहमण स

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