अब मैं उससे आजाद हूं। मैं समाज में नरक भोग रही ऐसी महिलाओं के लिए लड़ूंगी।

तीन तलाक, इद्दत व शरीयत के कानून का डर दिखाकर मुस्लिम समाज में महिलाओं पर अत्याचार किया जाता है। ‘‘मैंने दस साल तक यह जुल्म सहा है। मैंने दस महीने की बेटी को आंखों के सामने मरते हुए देखा है। मैं तिल-तिल कर रोज मरती रही। मैं अब शबनम नहीं दामिनी बनकर मुस्लिम समाज में व्याप्त कुरीतियों के बारे जीवन समर्पित कर दूंगी।’’ यह बात शबनम से हिन्दू धर्म अपनाने वाली महिला दामिनी ने कही। यह दामिनी न तो किसी फिल्म की कलाकार है न किसी राजनैतिक दल की नेता, कि सुर्खिया बटोरने के लिए पर्दे पर छाने के लिए इसने यह बयान दिया हो। बल्कि कल की शबनम आज दामिनी बनकर अपनी पीड़ा बयान कर रही है। दामिनी ने अपने ऊपर हुए एक-एक अत्याचार की कहानी बताई। उसने बताया कि जब वह 8वीं में थी, तभी रिश्ते के एक युवक से उसका निकाह करा दिया गया। इसके बाद जल्दी-जल्दी बच्चे पैदा करने के लिए कहा गया। दस साल में ही चार बच्चे हो गए। पहली बेटी को 2007 में पति ने पीट-पीट कर मार डाला। उसे हवा में ऊपर उछाल कर पटकता था। मेरे मना करने पर मुझे मारता-पीटता था। कई बार तलाक की धमकी देता था। मेरे दो बेटे और हैं उन्हें उसने अपने पास रखा हुआ है। न जाने कैसे होंगे मेरे बच्चे। 2014 में मुझे तीन तलाक देकर निकाल दिया।

दामिनी ने बताया कि पति द्वारा तीन तलाक देने के बाद चार माह इद्दत में बिताए। उसके बाद दूसरे मर्द के साथ हलाला के नाम पर उससे वेश्यावृत्ति कराई गयी। हर बात पर पिटाई और गालियों की बौछार सहना मेरी नियति बन गई थी। अब मैं उससे आजाद हूं। मैं समाज में नरक भोग रही ऐसी महिलाओं के लिए लड़ूंगी। दामिनी आज उस काले कफन से आजाद है जिसकी आड़ में उसे यह दर्द भरा जीवन मिला। आज वह अपने 10 माह के बेटे का नाम ओम रखकर खुश है वो खुश होकर कहती है कि मैंने स्वेच्छा से वैदिक रीति से हिन्दू धर्म अपना लिया और मानवता के नाते उसे कुछ संगठनों ने रोजगार का साधन भी उपलब्ध करा दिये।

यह एक नारी की वेदना का किस्सा है जो उसके शोषण का हाल बयान करता है अमूमन ऐसे मामलों में समाज दया का भाव प्रकट तो करता दिख जाता है किन्तु आगे बढ़कर सहायता नहीं करता। लेकिन ऐसा नहीं कि सब ऐसे है अभी कुछ दिनों पहले ही राजस्थान गंगापुर सिटी की खबर थी कि एक मुस्लिम लड़की फेहनाज शेख वर्तमान में प्रियांशी शर्मा के नाम से जानी जाती है। प्रियांशी बताती है कि उसके घर में महिलाओं से वैश्यावृत्ति करायी जाती थी जो उसे पसंद नहीं था उसने इस नरक से छुटकारा पाने के लिए दामोदर नाम के एक युवक से सहायता मांगी। दामोदर और उसके परिवार ने फेहनाज शेख को न केवल सहायता दी बल्कि उसे अपने परिवार में दामोदर की पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया. फेहनाज शेख से प्रियांशी बनी युवती बताती है कि वह उस समाज से निकलकर आई है जहाँ स्त्री को कोई सम्मान नहीं मिलता जबकि वैदिक धर्म में आकर मुझे लक्ष्मी जैसा सम्मान मिला है। 

वास्तव में मुसलमान समाज में सामान्य रुप से माना जाता है कि स्त्री मात्र पुरुष का एक शिकार है और पुरुष शिकारी। वह अपने पति की सहयोगी की बजाए नौकर समझी जाती है। छोटी-छोटी बातों में तलाक मिलना उसके बाद हलाला जैसी अमानवीय प्रथा से गुजरना लेकिन इन सबके बाद भी उसे कोई स्थाई ठिकाना मिले इस बात की कोई गारंटी नहीं होती है। क्योंकि अधिकांश मुस्लिम समाज उस आधुनिकता से डरता है जिसमें महिला समाज को स्वतंत्रता की बात होती है। हमेशा समुदाय विशेष के बीच यह बैचौनी व्याप्त रहती है कि महिलायें अपने प्रतिबंधों से आगे आ जायेंगी और अगली पीढ़ी के लिए रास्ता खोल देगी। सब जानते हैं कि भारत में अभी पिछले दिनों तीन तलाक और हलाला जैसी कुप्रथा पर किस तरीके से मुस्लिम मौलाना उग्र होकर सामने आये थे। 

यह एक शबनम से दामिनी बनी लड़की की कहानी नहीं है बल्कि यह एक सच है और ऐसी न जाने कितनी दामिनी आज शोषण की शिकार हैं उन्हें सहारे की जरूरत है बस अपनाने वाले दामोदर जैसे लोगों की बाट जोह रही हैं। सालों पहले मेरे एक बुजुर्ग कहा करते थे कि, मैंने भारतीय मुसलमान को कभी कोई युनिवर्सिटी, स्कूल या कॉलेज माँगते हुए नहीं देखा, न कभी वह अपने इलाके में अस्पताल के लिए आंदोलन चलाते हैं और न ही बिजली पानी के लिए! उन्हें चाहिए तो बस लाउडस्पीकर पर मस्जिद से अजान देने की इजाज़त और महिलाओं पर सातवीं शताब्दी के विवाह के सउदी अरब के नियम प्रचलन का कानून। 21वीं सदी में वह आज भी उस शरीयत को लागू करने के लिए जान देते हैं जिसमें सिर्फ एक नारी की कोमल भावनाओं का शोषण होता है। जिस कारण आज के समय के इन्सान के लिए यह एक चिन्तन का एक चिन्ह है। इसलिए वह नारी आज अपने वर्तमान को पहचानने की कोशिश कर रही है और इसी कोशिश में वह सैकड़ों साल पीछे जाकर अरब देश से चली परम्पराओं की कितनी ही घटनाओं में खुद को शोषण का शिकार पाती है। दामिनी जैसी हर एक नारी अपने गालों पर आसुंओं  के सूखे निशान लेकर इस समाज से आज अपने सवालों के जबाब लेने निकली है अपना पुराना नाम मिटाकर, अपना पता और धर्म मिटाकर जो कहती है अगर आपने मुझे कभी तलाश करना है तो जाओ हर देश, हर शहर की, हर गली का द्वार खटखटाओ-तब शायद जान पाओगे कि मैं एक शाप हूं या एक वरदान? मुझे सहारा देना पाप है या सम्मान?

-राजीव चौधरी

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