ईश्वर ने इस सृष्टि को, मनुष्यों व इतर सभी प्राणियों को बनाया है।

संसार में ईश्वर को मानने वाले और न मानने वाले दो श्रेणियों के लोग हैं। ईश्वर के अस्तित्व को न मानने वालों को नास्तिक कहते हैं। जो नास्तिक लोग हैं उनसे तो यह अपेक्षा की ही नहीं जा सकती है कि वह ईश्वर के सत्य स्वरूप जानते हैं। प्रश्न है कि जो ईश्वर को मानते हैं, क्या वह सब ईश्वर के सत्य स्वरूप को भी जानते हैं या नहीं? इसका उत्तर है कि नहीं, सभी आस्तिक लोग ईश्वर को सत्य स्वरूप को नहीं जानते। ईश्वर के यथार्थ स्वरूप को कुछ थोड़े लोग ही जानते हैं। ईश्वर को यथार्थ रूप में जानने वाले वे लोग हैं जो वेद, सत्यार्थप्रकाश सहित ऋषि दयानन्द के साहित्य एवं वेदांग, उपांग सहित उपनिषदों व मनुस्मृति आदि का यथार्थ ज्ञान रखते हैं। दूसरे शब्दों में हम यह भी कहेंगे कि जो लोग वैदिक सनातन धर्मी आर्य हैं, निरन्तर स्वाध्याय करते हैं, चिन्तन व मनन करते हैं, जो शुद्ध भोजन व छल-कपट रहित शुद्ध व्यवहार करते हैं, वह लोग ही ईश्वर के यथार्थ स्वरूप को जानते हैं। इतर जो आस्तिक लोग हैं, जो कहते हैं कि वह ईश्वर को मानते हैं, उनके बारे में यह कह सकते हैं कि उनका ईश्वर का ज्ञान अधूरा व कुछ यथार्थ स्वरूप के विपरीत होने से मिथ्याज्ञान से युक्त ज्ञान है। जो व्यक्ति मूर्ति पूजा करता है, अवतारवाद को मानता है, सामाजिक भेदभाव से युक्त जिसका जीवन है, जो फलित ज्योतिष को मानता है, जो वैदिक रीति से ईश्वरोपासना नहीं करता, उसके बारे में यह कहना होगा कि वह ईश्वर के स्वरूप को यथार्थ रूप में नहीं जानता। कुछ ऐसे लोग हैं जो कहते हैं कि ईश्वर ऊपर या किसी विशेष आसमान व स्थान पर रहता है, वह भी अविद्या से ग्रस्त होने के कारण ईश्वर के यथार्थ स्वरूप से परिचित नहीं है। ऐसे भी मत हैं जिनके अनुयायी ईश्वर को पापों को क्षमा करने वाला मानते हैं। पापों को क्षमा करने का मतलब होता है कि पाप को बढ़ावा देना। यदि हमारे पाप क्षमा होने लगें या हमारी गलतियां क्षमा होने लगें तो फिर हम अधिक लापरवाह हो जाते हैं और बार बार गलती करते हैं क्योंकि हम जानते हैं कि हम क्षमा मांग कर अपराध व उसके दण्ड से बच जायेंगे। पाप क्षमा के मिथ्या सिद्धान्त से बुराईयां व अपराध बढ़ते हैं। जो लोग यह कहते व मानते हैं कि उनका ईश्वर अमुक मत के अनुयायियों के पापों व गलतियों को क्षमा कर देता है, वह उनके मत वाले भी ईश्वर के सत्य स्वरूप को यथार्थतः नहीं जानते है। जो लोग भोले भाले भूखे, निर्धन, रोगी, कमजोर व दुःखी लोगों का धर्म परिवर्तन करने में संलग्न होते हैं, वह भी सच्चे ईश्वर को नहीं जानते व जान सकते। उनका यह काम धर्म सम्मत न होकर धर्म विरोधी होता है। इसके पीछे के उद्देश्य भी अच्छे न होकर बुरे ही होते हैं। ऐसे लोगों को धर्म विषय चर्चा करने के लिए आमंत्रित किया जाये तो सामने नहीं आते परन्तु येन केन प्रकारेण धर्मान्तरण करने में तत्पर रहते हैं। हमें लगता है कि ऐसे लोगों को इनके इन कर्मों का फल मृत्यु के बाद पुनर्जन्म में ही प्रायः मिलता है। उपेक्षित व निर्बल लोगों का धर्म परिवर्तन न कर स्वयं को धार्मिक कहलाने वाले लोगों को इनकी सच्चे हृदय से सेवा करनी चाहिये, यही उनका यथार्थ धर्म है। ईश्वर सभी मनुष्यों से ऐसी ही अपेक्षा करता है।

 ईश्वर ने इस सृष्टि को, मनुष्यों व इतर सभी प्राणियों को बनाया है। यह सृष्टि ईश्वर ने जीवात्माओं को उनके पूर्व जन्मों के अवशिष्ट कर्मों के फलों के भोग के लिए बनाई हैं। मनुष्य अपना भोग भोगते हैं और मोक्ष प्राप्ति के लिए परोपकार व सेवा आदि कार्य करते हैं। पशु व पक्षी भी अपना अपना भोग भोगते हैं। ईश्वर ने किसी को यह अधिकार नहीं दिया कि वह अपने भोजन व जीभ के स्वाद के लिए पशुओं को काट कर, उन्हें मार कर व उनकी हत्या कर उनका मांस आदि का भोजन के रूप में सेवन करे। यह ईश्वर की व्यवस्था का विरोध व ईश्वर को चुनौती है। यदि कोई मनुष्य, मत व सम्प्रदाय ऐसा मानता है कि पशुओं का मांस खाने व अण्डे आदि का तामसिक भोजन करने में कोई पाप नहीं है तो वह भी बड़ी भूल व गलती कर रहे हैं। ऐसे लोग भी ईश्वर का सत्य स्वरूप नहीं जानते। इस प्रकार चिन्तन करने से हम इसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि जो मनुष्य वेदों के यथार्थ स्वरूप से परिचित हैं तथा जिसने वेदानुकूल वेदों के अंग व उपांग रूप सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, आर्याभिविनय, पंचमहायज्ञविधि आदि ग्रन्थों को पढ़ा व समझा है, वही ईश्वर के सत्य स्वरूप को जानते हैं। ऐसा व्यक्ति न तो मांसाहार कर सकता है, न किसी का शोषण कर सकता है, न किसी से अन्याय कर सकता है, ऐसा व्यक्ति ईश्वर के सत्य स्वरूप का उपासक होगा, वह परोपकार व सेवा भावी होगा, माता-पिता व आचार्यों का आदर व सम्मान करने वाला होगा, सद्कर्मों का सेवन करने वाला होगा तथा नियमित स्वाध्याय करने के साथ वैदिक व आर्य विद्वानों के ज्ञानयुक्त उपदेशों का श्रवण करेगा। ऐसे व्यक्ति के बारे में हम यह कह सकते हैं कि वह ईश्वर का सत्य स्वरूप जानता है।

हमारी दृष्टि में ईश्वर को मानने वाले तो सभी आस्तिक मतों के लोग हैं परन्तु ईश्वर का सत्य व यथार्थ स्वरूप जानने वाले कुछ गिने चुने लोग ही होते हैं जो कि अधिकांश में वैदिक सनातन धर्मी आर्यसमाज के अनुयायी ही सिद्ध होते हैं। हमारा कर्तव्य है कि हम अपने आचरण व वाणी से प्रचार कर अन्य मतों के आचार्यों व अनुयायियों की अविद्या समाप्त करने का प्रयास करें जिससे सब एक मतस्थ होने की दिशा में कुछ आगे बढ़ सकें। हमारा निष्कर्ष यह है कि संसार में ईश्वर का सत्य स्वरूप जानने वाले कम ही लोग हैं और जो उसे जानते भी हैं, उनमें से बहुत कम ही ईश्वर की यथार्थ उपासना करते हैं। ईश्वर के सत्यस्वरूप के प्रचार व प्रसार में आर्यसमाज का उत्तरदायित्व सबसे अधिक है। इसलिए आर्यसमाज को शिथिलता का त्याग कर प्रभावशाली प्रचार करने की आवश्यकता है। इति ओ३म् शम्।

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