: Dead
: 17-07-1867
: Parishitgadh, Merath
: 17-07-1915
: Vishucika Rog

Father :

Pandit Hazari Lal Swami

 अपने यग के अदवितीय शासतरजञ, वागमी तथा लेखक पं. तलसीराम सवामी का जनम जयेषठ शकला 3 सं. 1924 वि. (1867) को मेरठ जिले के परीकषितगढ गराम में पं. हजारीलाल सवामी के यहां हआ। आपकी परारमभिक शिकषा पिता के साननिधय में हई। 9 वरष की आय में आपका यजञोपवीत संसकार समपनन हआ। 11 वरष की आय में बालक तलसीराम पर शीतला रोग का परकोप हआ, फलसवरूप उनके क नेतर की जयोंति नषट हो गई। गढमकतेशवर में उनहोंने पं. लजजाराम से संसकृत भाषा तथा वयाकरण का अधययन किया और अनय शासतर भी पढ़े। 1940 वि. में सवामी दयाननद रचित सतयारथपरकाश, ऋगवेदादिभाषयभूमिका तथा वेदांगपरकाश आदि गरनथों के पढ़ने से उनका काव आरयसमाज की ओर हआ। पनः 1941 वि. में देहरादून में उनहोंने पं. यगलकिशोर से अषटाधयायी तथा महाभाषय का अधययन किया। सवामी दयाननद के गरनथों के लिपिकरता पं. दिनेशराम से भी पढ़ने का उनहें अवसर मिला था। 

            मेरठ के परसिदध आरयसमाजी विदवान पं. घासीराम के समपरक में आने पर पं. तलसीराम विधिवत आरयसमाज के सभासद बन गये। 1887 ई. में जब ततकालीन पशचिमोततर परदेश तथा अवध (वरतमान उततरपरदेश) की आरय परतिनिधि सभा की सथापना हई तो पं. तलसीराम ने उसमें अपना योग दिया। वे कछ काला तक मेरठ के देवनागरी विदयालय में अधयापक भी रहे। जब परसिदध सनातनधरमी विदवान पं. अमबिकादतत वयास मेरठ आकर पौराणिक मत का परचार करने लगे तो पं. तलसीराम ने परबल यकतियों तथा शासतरीय परमाणों के बल पर वयासजी के मनतवयों का खणडन किया। इस पर देवनागरी विदयालयों के परबनधक उनसे रषट हो गये। सवामीजी ने भी इस संसथा से तयागपतर दे दिया और सरवातमना आरयसमाज के कारय में लग गये। 

            आरयसमाजिक जीवन-पं. तलसीराम सवामी ने आरयसमाज के शासतरारथकरता के रूप में कीरति अरजित की तथा कचेसर, मवाना, परीकषितगढ, आरा, दानापर, किराना आदि अनेक सथानों पर भिनन मतावलमबियों को शासतरारथ समर में पराजित किया। 1948 वि. में वे आरय परतिनिधि सभा पशचिमोततर परदेश के उपदेशक नियकत ह तथा परानत में सरवतर भरमण कर परचार कारय में जट गये। 1950 वि. में सवामी दयाननद के शिषय पं. भीमसेन शरमा ने पं. तलसीराम को परयागसथित अपने सरसवती यंतरालय का परबनधक नियकत किया। अतः वे परयाग आ गये और पं. भीमसेन शरमा के सहयोगी बन कर लेखन कारय तथा आरय सिदधानतके मासिक के समपादन में उनकी सहायता करने लगे। 

            1955 वि. में पं. तलसीराम ने मेरठ में सवामी परेस की सथापना की तथा साहितय लेखन वं परकाशन का महान सारसवत यजञ आरमभ किया। जनवरी 1897 में उनहोंने वेदपरकाशमासिक पतर का परकाशन किया। यह पतर अपने यग का परसिदध तथा लोकपरिय मासिक था। इसमें आरय सिदधानतों का मणडन तथा आरयसमाज के मनतवयों पर कियें जाने वाले आकषेपों का सपरमाण खणडन किया जाता था। आरयसमाज की ततकालीन गतिविधियों तथा अनय मतावलमबियों से होने वाले संघरषों, शासतरारथों तथा विवादों की जानकारी परापत करने के लिये इस पतर की फाइलें आवशयक सरोत के तलय है। 1898 में पं. तलसीराम ने पं. लेखराम आरयपथिक की समृति में क उपदेशक विदयालय सथापित किया। इसी विदयालय में अधययन कर पं. सतयवरत शरमा, पं. रदरदतत शरमा, पं. जवालादततशरमा, पं. मणिशंकर, पं. मनदतत तथा सवामी ओंकार सचचिदाननद आदि उपदेशक आरयसमाज के परचारक बने। 

            1909 से 1913 तक पं. तलसीराम आरय परतिनिधि सभा के परधान रहे। उनके कारयकाल में ही संयकत परानत के गवरनर सर जैमस मैसटन 8 अगसत 1913 को गरकल वृनदावन में आये तथा उनहोंने गरकल शिकषा परणाली की भूरि-भूरि परशंसा की थी। उस समय पं. तलसीरामजी गरकल में शिकषण कारय भी करते थे। 17 जलाई 1915 की विशूचिका रोग से पं. तलसीराम सवामी का निधन हो गया। 

            पं. तलसीराम सवामी की साहितय साधना-सवामीजी ने अपने लेखन के दवारा आरयसमाज को उतकृषट साहितय परदान किया है। विभिनन शासतरों के टीका, भाषय आदि के अतिरिकत उनहोंने खणडनमणडन से समबनधित अनेक महततवपूरण गरनथों का परणयन किया। वैदिक सिदधानतों पर किये जाने वाले आकषेपों तथा सवामी दयाननद की कृतियों पर लगाये जाने वाले आरोपों का उततर उनहोंने नितानत परौढ़ता के साथ दिया है। 

            ले. का.-ऋगवेद भाषय-सवामी दयाननद ऋगवेद के सपतम मणडल के 61वें सूकत के दवितीय मनतर तक ही भाषय कर सके थे। इसके आगे के मनतरों का भाषय पं. तलसीराम ने लिखना आरमभ किया था जो वेदपरकाश में जलाई 1916 से धारावाही छपने लगा। पं. तलसीराम के निधन के उपरानत उनके अनज पं. छटटनलाल ने इसे आगे लिखने का उपकरम किया। खेद है कि ऋगवेद का यह आंशिक भाषय पसतक रूप में परकाशित नहीं हआ। 

            सामवेद भाषय-पं. तलसीराम कृत सामवेद भाषय संसकृत तथा हिनदी दोनों भाषाओं में लिखा गया है। परारमभ में यह मासिक रूप में जयेषठ 1955 वि. (24 मई 1898) से परकाशित होने लगा। पशचात दो भागों में सवामी परेस मेरठ से 1957 वि. में छपा। कालानतर में सारवदेशिक आरय परतिनिधि सभा तथा दयाननद संसथान ने इसी भाषय को चतरवेद भाषय परकाशन योजना के अनतरगत परकाशित किया। 

            उपनिषद भाषय-कई उललेखों से पता चलता है कि सवामीजी ने ईश, केन, कठ तथा मणडक इन चार उपनिषदों पर भाषय लिखा था, किनत हमारी जानकारी में उनहोंने शवेताशवतरोपनिषद पर ही संसकृत तथा हिनदी में परौढ़ भाषय लिखा था जो 1897 में परकाशित हआ। 

            मनसमृति भाषय-कषेपक अंशों के सतरक विवेचन से यकत मनसमृति की यह पाणडितयपूरण टीका 1909 में परकाशित हई। 1979 वि. तक इसके 9 संसकरण छप चके थे जो गरनथ की अपार लोकपरियता सूचित करते हैं। 

            षडदरशन भाषय-पं. तलसीराम ने सांखय, योग, नयाय, वैशेषिक, वेदानत तथा मीमांसा (केवल 25 सूकत) पर संकषिपत किनत यकतिपूरण भाषय लिखा। इन भाषय गरनथों के अनेक संसकरण निकले। विदरनीति की टीका 1955 वि. (1898 मई) में परकाशित हई। सवामीजी दवारा रचित शरीमदभगवदगीता का वैदिक मनतवयानकूल भाषय अतयनत लोकपरिय हआ। रामलाल कपूर टरसट ने 2034 वि. (1977) में इसका क समपादित संसकरण परकाशित किया। वेदारमभ (परथम भाग)

            नारदीय शिकषा-शिकषा शासतर विषयक यह दरलभ गरनथ पं. तलसीराम सवामी दवारा समपादित होकर फालगन 1963 वि. में परकाशित हआ। शलोकबदध वैदिक निघणट-अगनिचित शरी भासकरराय दीकषित कृत निघणट (समपादित) 1898

            आरय चरपटपंजरिका-शंकराचारय कृत चरपटपंजरिका सतोतर को वैदिक सिदधानतों के अनकूल परिवरतन कर हिनदी टीका सहित सवामी जी ने 1896 में सरसवती यंतरालय इटावा से परकाशित किया। 

 

खणडन-मणडन के गरनथ

            ऋगवेदादिभाषयभूमिकेनदूपराग (दवितीयोशं:)-बरेली के बरहमकशल उदासीन ने सवामी दयाननद कृत ऋगवेदादिभाषयभूमिका का खणडन करते ह ऋगादिभाषयभूमिकेनदनामक क गरनथ कई खणडों में लिखा था। इसके क अंश का उततर सवामीजी ने उकत गरनथ लिखकर दिया जो सरसवती यंतरालय, इटावा से 1950 वि. (1893) में परकाशित हआ। 

            भासकरपरकाश-सनातनधरमी विदवान पं. जवालापरसाद मिशर ने सतयारथपरकाश के खणडन में दयाननदतिमिर भासकर गरनथ लिखा, जिसे बमबई के परसिदध परकाशक कषेमराज शरीकृषणदास ने 1951 वि. में परकाशित किया थ। पं. तलसीराम ने मिशरजी के इस गरनथ का सपरमाण खणडन   भासकरपरकाशलिखकर किया। इसका परथम भाग सतयारथपरकाश के परथम तीन समललासों के मणडन रूप में परणीत सवामी बरहमाननद दवारा समपादित ‘‘भारतोदधारकमासिक पतर में धारावाही छपना परारमभ हआ। कालानतर में 1897 में यह गरनथ परथम बार पसतकाकार छपा। पनः समपूरण गरनथ इसी वरष (1897) सवामी परेस, मेरठ से परकाशित हआ। इस गरनथ की लोकपरियता इसके अनेक संसकरणों (दवितीय संसकरण 1904, तृतीय संसकरण 1913) से विदित होती है। 

            दिवाकरपरकाश-भासकरपरकाश के परथम तीन अधयायों के खणडन में पं. जवालापरसाद मिशर के अनज पं. बलदेवपरसाद मिशर ने धरमदिवाकरनामक गरनथ की रचना की।